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महिलाओं को केंद्र में रखकर लेखिका अंकिता जैन ने दी कलम को धार

- पिता की नाराजगी के बावजूद सहायक प्राध्यापक की नौकरी छोड़ सिर्फ लिखने को चुना

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भोपाल@रूपेश मिश्रा

लेखनी का एक जुनून होता है और यदि वो जुनून आपके अंदर हैं तो आप एक न एक दिन जरूर लेखक बन ही जाएंगे। मध्यप्रदेश के गुना जिले की रहने वाली अंकिता जैन ने एमटेक की पढ़ाई की और उसके बाद कॉलेज में सहायक प्राध्यापक भी बनीं। लेकिन नौकरी की बंदिशें पसंद नहीं आई लिहाजा सबकुछ छोड़ सिर्फ लेखन के काम में जुट गईं। लेखिका अंकिता जैन बताती हैं कि उनके लेखन के केंद्र में महिलाएं होती हैं। उन्होंने महिलाओं की प्रेगनेंसी को समर्पित एक किताब मैं से मॉ तक लिखी।जिसमें महिलाओं के उस दर्द को उकेरा गया जिन्हें सिर्फ एक महिला ही समझ सकती है और उसे अभी तक किताब का स्वरूप नहीं दिया गया था। अंकिता अभी तक कुल पांच किताबें लिख चुकी हैं।

खुद पर गुजरी तब दिया शब्दों का प्रारूप

जब तक खुद पर नहीं गुजरती तब तक आप उस दर्द को महसूस नहीं कर पाते। अंकिता जैन शादी के बाद छत्तीसगढ़ चली गईं। जहां उनका पहला बच्चा मिसकैरेज हो गया। तभी अंकिता ने दूसरी किताब मैं से मां तक लिखी। अंकिता कहती हैं कि प्रेगनेंसी के दौरान सलाना देश में हजारों महिलाएं मौत की भेंट चढ़ जाती हैं लेकिन ये कभी मुद्दा नहीं बना। लेकिन ये एक बड़ा अभिशाप है। मुझ पर गुजरी तब मैंने महसूस किया। इसलिए मेरी किताब में दवाईयां और योगा नहीं बताया गया है। बल्कि उस दौरान एक महिला को जिन भावनाओं की जरूरत होती है। उसे उकेरा गया है। अंकिता के लेखनी का मुख्य उदेश्य महिलाओं को जागरूक और सशक्त बनाना है।

पिता बोलते थे लिखना कोई नौकरी है क्या?

अंकिता कहती हैं कि इतना पढ़ने के बाद जब मैंने सिर्फ लिखने का फैसला किया तब पिता जी बहुत नाराज हो गए थे। लेकिन मॉ मेरे साथ थीं। दरअसल पिता जी को लगता था इतना पढ़ने- लिखने के बाद ये करना ठीक नहीं है। और इससे क्या आमदनी होगी। लेकिन जब धीरे- धीरे चीजें आगे बढ़ने लगी। इससे ठीक- ठाक आमदनी होने लगी। तब सब कुछ सामान्य होने लगा।