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रेडियो कॉलर से त्वचा में आई नमी, संक्रमण बना चीता सूरज की मौत का कारण

सूरज से पहले तेजस की गर्दन में भी इसी तरह का घाव मिला था, फिर भी अफसरों ने नहीं दिया ध्यान, देश में पहली बार इस तरह इंफेक्शन से चीता की मौत

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भोपाल। चीता सूरज और तेजस की मौत के मामले में वन विभाग के अफसरों की बड़ी लापरवाही रही। 9 वनकर्मियों की टीम हर चीता की लगातार मॉनिटरिंग करती है, मंगलवार को तेजस के गले में घाव के बाद भी मॉनिटरिंग दल ने अन्य चीतों पर ध्यान नहीं दिया। तीन दिन बाद इसी तरह का घाव सूरज के गले में भी दिखाई दिया। चीता स्टेयरिंग कमेटी के अध्यक्ष राजेश गोपाल का कहना है कि रेडियो कॉलर से आई नमी के चलते त्वचा में संक्रमण हो गया। संक्रमण में मख्खी ने अंडे दे दिए, जिसने घाव को इतना गंभीर बना दिया कि चीता की मौत हो गई। वहीं, पीसीसीएफ वन्य प्राणी जेएस चौहान का कहना है कि आज तक रेडियो कॉलर से संक्रमण का मामला सामने नहीं आया है। सूरज से पहले तेजस को भी इसी तरह का घाव था।

वेटेनरी डॉक्टर्स की व्यवस्था पर भी सवाल

राजेश गोपाल के अनुसार रेडियो कॉलर से संक्रमण होने का देश में यह अनोखा मामला है। यह बेहद चौकाने वाला मामला है। 9 सदस्यीय टीम लगातार मॉनिटरिंग करती है। 24 घंटे में एक बार टीम पास जाकर उनकी सेहत परखती है। संक्रमण फैलने में महज 8 से 10 घंटे का समय लगता है। घाव स्कीन से होते हुए पीठ तक चला गया। स्टेयरिंग कमेटी की बैठक में निर्देश दिए हैं कि वेटेनरी व्यवस्था को और बेहतर बनाया जाए। बाड़े में भी लगातार चीतों की मॉनिटरिंग बेहतर हो, ताकि उन्हें किसी भी तरह के संक्रमण से बचाया जा सके। गश्ती दल को भी बड़ा करने के निर्देश दिए गए हैं।

अब ग्रामीणों को जोड़ने की कवायद

स्टेयरिंग कमेटी ने कूनो नेशनल पार्क के आसपास बसे गांवों में ग्रामीणों को भी चीता प्रोजेक्ट से जोड़ने के निर्देश दिए। बैठक में ये चर्चा भी हुई कि यदि ग्रामीणों की आय के स्त्रोत होंगे तो वे भी मॉनिटरिंग व्यवस्था को बेहतर बना सकेंगे। चीता सूरज की गर्दन में मिले त्वचा संक्रमण के अलावा 11 जुलाई को मरे चीता तेजस को भी इस प्रकार का त्वचा संक्रमण मिला था। अब सभी 15 चीतों में रेडियो कॉलर वाले गर्दन के हिस्से देखा जाएगा कि कोई घाव तो नहीं है, मक्खियां बैठ रही है या नहीं? इसके साथ सभी 15 चीतों को इस प्रकार के संक्रमण के उपचार के लिए इंजेक्शन लगाना शुरू कर दिए गए हैं

मॉनिटरिंग पर उठ रहे सवाल

बीते साढ़े चार साल में 5 वयस्क चीतों की मौत और इनमें 4 दिन में ही दो चीतों मौतों से मॉनिटरिंग पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। हालांकि खुले जंगल में एक चीता के पीछे 8-8 घंटे की ड्यूटी में 3 टीमें लगी हुई हैं, लेकिन सवाल ये है कि चीता की ट्रैकिंग और मॉनिटरिंग के दौरान टीम को चीते की गर्दन का संक्रमण और घाव कैसे नजर नहीं आए? यदि त्वचा संक्रमण था तो मक्खियां तो कई दिनों से बैठ रही होंगी, तो पहले कैसे नहीं दिखी? वहीं उपचार में भी देरी की स्थिति नजर आ रही हैं, क्योंकि सूरज सुबह साढ़े 6 बजे मॉनिटरिंग टीम को सुस्त दिखा, लेकिन सुबह 9 बजे टीम उपचार के लिए पहुंची, तब तक उसकी मौत हो गई। वहीं 11 जुलाई को तेजस सुबह 11 बजे घायल दिखा, लेकिन उपचार को टीम 2 बजे पहुंची।