
भोपाल। नाम ये भूल जाएगा..चेहरा ये बदल जाएगा.. मेरी आवाज ही पहचान है...गर याद रहे...आज भले ही स्वर कोकिला लता मंगेशकर हमारे बीच नहीं रहीं। लेकिन उनका यह गाना उन्हीं की पहचान बनकर अमर होता महसूस होता है। मखमली आवाज से दुनिया भर में अपना जादू बिखरने वाली लता आज अपनी आवाज से ही अमर हैं। उनके जन्म दिन पर आज हम आपको बता रहे हैं उनकी जिंदगी के ऐसे संघर्ष जिनके आगे उन्होंने कभी हार नहीं मानी, बल्कि हर मुश्किल को अपने लिए एक नई प्रेरणा मानते ऊंचाइयों के शिखर चढ़ती चली गईं...
13 साल की उम्र मे सिर पर आई घर की जिम्मेदारी
आज हर किसी के मन में यह सवाल आता है कि आखिर लता मंगेशकर ने ता उम्र शादी क्यों नहीं की? इसके जवाब में वे तरह-तरह की बातें भी सोचते हैं। लेकिन आपको बता दें कि इस बात का खुलासा खुद लता मंगेशकर ने एक इंटरव्यू में किया था। लता जी के मुताबिक, जब वो 13 साल की थीं तब उनके पिता का निधन हो गया था। ऐसे में उन पर घर-परिवार और अपने भाई-बहनों की जिम्मेदारी आ गई थी। ऐसे में कई बार उन्हें ख्याल आया कि उन्हें अब शादी कर लेनी चाहिए। लेकिन इस ख्याल को वह कभी अमल में नहीं ला सकीं। वे कहती थीं 'कम उम्र से ही मैंने काम शुरू कर दिया था जिसके बाद काम और परिवार में इतनी व्यस्त हो गई कि शादी के बारे में सोचने का अवसर ही नहीं मिला।'
11 साल की उम्र में बनी गायक
आपको बता दें कि लता मंगेशकर ने 11 साल की उम्र में ही गाना शुरू कर दिया था। लेकिन जब वो 13 साल की हुईं, तब उन्होंने मराठी फिल्म 'पहली मंगलागौरÓ के लिए एक गीत गाया। उन्होंने अपना पहला गाना मराठी फिल्म 'कीर्ती हसाल' (कितना हसोगे) (1942) में गाया था। लता ने साल 1947 में हिंदी सिनेमा के लिए गाना शुरू किया था। इस दौरान उनकी उम्र महज 18 साल थीं। सबसे पहले लता ने फिल्म 'आपकी सेवा' के लिए गाना गाया था।
यह था उनका आखिरी रिलीज सॉन्ग
आपको बता दें कि लता मंगेशकर ने लगभग 36 भारतीय भाषाओं में 50 हजार से ज्यादा गानों को अपनी आवाज दी थी। ऐसे में अगर उनके आखिरी रिलीज गाने की बात की जाए तो वह है 'सौगंध मुझे इस मिट्टी की' जिसे मयूरेश पई ने कंपोज किया था। यह गाना 30 मार्च 2019 को रिलीज किया गया था। यह गाना राष्ट्र और भारतीय सेना के सम्मान के लिए प्रस्तुत किया गया था। वहीं उनके आखिरी फिल्मी गाने की बात की जाए, तो यह साल 2006 में रिलीज हुई 'रंग दे बसंती' का गाना 'लुका-छिपी बहुत हुई' था। इस गाने को एआर रहमान ने कंपोज किया था। लता मंगेशकर की आखिरी हिंदी ऐल्बम की बात की जाए तो यह साल 2004 में रिलीज हुई फिल्म 'वीर-जारा' थी।
पहले ही गाने में रिजेक्ट हो गई थीं लता
आपको जानकर हैरानी होगी कि छोटी सी उम्र से गीत गाने वाली लता मंगेशकर की आवाज को जब बॉलीवुड गीत के लिए सुना गया, तो उन्हें रिजेक्ट कर दिया गया था। दरअसल, लता जी के गुरु गुलाम हैदर ने एस मुखर्जी को फिल्म 'शहीदÓ के लिए लता की आवाज सुनाई थी, तब उन्होंने आवाज पतली बताकर उन्हें गाने के लिए मना कर दिया गया था।
जानें पूरा किस्सा
एक बार जब गुलाम हैदर, लता मंगेशकर और दिलीप कुमार मुंबई की लोकल ट्रेन में कहीं जा रहे थे, तब हैदर ने दिलीप कुमार को लता की आवाज सुनाने के बारे में सोचा। ऐसे में लता जी ने गाना शुरू किया और दिलीप ने उन्हें टोकते हुए कहा कि मराठियों की आवाज से 'दाल-भातÓ की गंध आती है। इसके बाद लता जी ने अपने उच्चारण पर काम किया और हिंदी के साथ ही उर्दू भाषा पर भी अपनी पकड़ मजबूत की।
फिर हुर्ईं स्वर कोकिला
लता मंगेशकर के सुरों का जादू ऐसा चला कि कोई अन्य गायक उनके सामने टिक ही नहीं पाता था। इसमें फीमेल ही नहीं बल्कि मेल गायक भी थे, जिन्हें उनके सामने या साथ गाने में हिचकिचाहट होती थी। एक दौर ऐसा आया कि सारी दुनिया में वह स्वर कोकिला के नाम से जानी जाने लगीं। वहीं संगीत की दुनिया में उनके अमूल्य और कभी न भूलने वाले योगदान के लिए उन्हें वर्ष 2001 में भारत रत्न, 169 में पद्म भूषण और 1999 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। वहीं, वे तीन राष्ट्रीय और चार फिल्मफेयर पुरस्कारों से भी सम्मानित की गई थीं। इसके अलावा उन्हें दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका था।
Published on:
28 Sept 2022 12:43 pm
बड़ी खबरें
View Allभोपाल
मध्य प्रदेश न्यूज़
ट्रेंडिंग
