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इस शुभ योग में मनेगी मकर संक्रांति, सूर्य पूजा के बाद जरूर करें ये काम, धन-धान्य से भर जाएगी तिजोरी

पंडित अमर डब्बावाला ने बताया, पंचांग की गणना के अनुसार पौष मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि के ऊपरांत रात्रि पश्चात सूर्य का धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश होगा, अर्थात 14 तारीख की रात और 15 जनवरी की प्रात: 3 बजे सूर्य का मकर राशि में प्रवेश होगा। जब संक्रांति का रात्रि या अपर रात्रि में हो तो पर्व कल अगले दिन मनाने की बात कही गई है...

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मकर संक्रांति पर भगवान सूर्य धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करेंगे, साथ ही दक्षिण को छोड़ सूर्य उत्तर में प्रवेश करेंगे अर्थात उत्तरायण होंगे। इस स्थिति में संक्रांति 15 जनवरी को मनाई जाएगी। शास्त्रों के अनुसार, दान, स्नान और पूजन के लिए विशेष मानी जानी वाली संक्रांति का पुण्यकाल 15 जनवरी को है। अधिकांश लोग सोमवार को पर्व मनाएंगे, हालांकि कुछ लोग 14 जनवरी को पर्व मनाएंगे।

पंडित अमर डब्बावाला ने बताया, पंचांग की गणना के अनुसार पौष मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि के ऊपरांत रात्रि पश्चात सूर्य का धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश होगा, अर्थात 14 तारीख की रात और 15 जनवरी की प्रात: 3 बजे सूर्य का मकर राशि में प्रवेश होगा। जब संक्रांति का रात्रि या अपर रात्रि में हो तो पर्व कल अगले दिन मनाने की बात कही गई है। 15 जनवरी को मकर संक्रांति का पुण्य काल मनाया जाएगा। चावल-हरी मूंग की दाल की खिचड़ी, दान पात्र का दान, वस्त्र दान की परंपरा है।

धन-धान्य के साथ ही विशेष लाभ के लोगवारियान योग की साक्षी में परिभ्रमण होने का लाभ राष्ट्र को प्राप्त होगा। आर्थिक प्रगति के द्वार खुलते हैं क्योंकि वरियान योग के अधिपति कुबेर हैं। इस दृष्टिकोण से धान्य संपदा, पशु संपदा और परिश्रम का विशिष्ट लाभ दिखाई देगा। संक्रांति के समय वार का नाम घोरा रहेगा। इसका अर्थ है कि संक्रांति के 30 दिन पर्यंत विशेष परिश्रम के माध्यम से शासन में परिवर्तन दिखाई देंगे।

वरियान योग में संक्रांति का पुण्यकाल

डब्बावाला ने बताया, ज्योतिष शास्त्र में 27 योगों का उल्लेख दिया गया है। इनमें से वारियान योग महत्वपूर्ण है। इसमें मकर संक्रांति का पुण्यकाल इसलिए भी विशेष माना जाता है, क्योंकि संक्रांति का पर्व दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर होता है अर्थात धनु राशि के सूर्य का मकर राशि में परिभ्रमण संक्रांति की स्थिति दर्शाती है। दक्षिण को छोड़ सूर्य उत्तर में प्रवेश करते हैं अर्थात उत्तरायण होते हैं।

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बैठी हुई अवस्था में संक्रांति

पंडित अमर डब्बावाला ने बताया, संक्रांति की अलग-अलग प्रकार की अवस्थाएं होती हैं। यदि खड़ी और बैठी हुई का फल अलग-अलग होता है। इस बार संक्रांति की अवस्था बैठी हुई है। अर्थात यह किसी विशेष कार्य को भी दर्शा रही है, वहीं राष्ट्रों में समान स्थिति को समान रूप से संतुलित करने की आवश्यकता प्रशासन तथा राजनेताओं की रहेगी।

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