
Merry Christmas 2017 in Bhopal
भोपाल। शहर में क्रिसमस पर्व को लेकर जोरदार तैयारियां शुरू हो गई हैं। चर्चों में होने वाले कार्यक्रमों को अंतिम रूप दिया गया है। स्कूल, बाजार, घरों से लेकर रेस्टोरेंट में भी तैयारियां की जा रही हैं। चर्च और घरों में प्रभु ईशु के स्वागत की तैयारियां चल रही हैं। बाजारों में रंग-बिरंगी सीरीज, कैंडल, स्टार, क्रिसमस ट्री सहित अन्य गिफ्ट आयटम की दुकानें भी सजकर तैयार हैं। मिशनरी स्कूलों में भी क्रिसमस सेलीब्रेट करने के लिए बच्चे सांस्कृतिक कार्यक्रम की रिहर्सल में जुटे हैं। चर्चों में भी विशेष सजावट की जा रही है। जहांगीराबाद में जिंसी चौराहे के पास एक बड़ा सा प्रवेश द्वार प्रभु यीशु के जीवन की झलकियां दिखाता है। अगर आप अध्यात्म पसंद व्यक्तित्व के हैं, तो आपको एक सुकून की अनुभूति होगी। कुछ ऐसी ही आभा है सेंट फ्रांसिस असिसि कैथेड्रल चर्च की। भोपाल शहर में कैथोलिक ईसाई समुदाय का यह पहला चर्च है। इसे पोप पॉल चतुर्थ ने आर्च डायसिस का दर्जा प्रदान किया है। 140 वर्ष पुराना यह चर्च आज भी अपनी ऐतिहासिक गौरव गाथा को बयां करता है। जितना अद्भुत यह चर्च है, इसका इतिहास भी उतना ही अनूठा है।
बोरबोन परिवार से पुराना नाता
नवाब शासन काल के दौरान बने इस चर्च का बोरबोन परिवार से पुराना नाता है। इस परिवार के पूर्वज मूल रूप से फ्रांस के निवासी थे। भोपाल नवाब नजीर उल्हा मोहम्मद खान के दरबार में शाहजाद मसीह प्रधानमंत्री थे। शाहजाद का असली नाम बाल्थाजार बोरबोन है। इनकी पत्नी का नाम इसाबेला एलिजाबेथ बोरबोन था। इन्हें दुल्हन साहिबा के नाम से भी जाना जाता है।
सिकंदर जहां बेगम ने दी थी जमीन
इस चर्च को बनाने की अनुमति रियासत भोपाल की 8वीं शासिका सिकंदर जहां बेगम द्वारा दी गई थी। राजकुमारी इसाबेला ने 4 अक्टूबर 1873 को चर्च बनाने का काम शुरू करवाया था। इसके लिए उन्होंने जमीन दान में दी थी। पहले 10 बीघा जमीन में से 3 बीघा और उसके बाद 7 बिश्वा में से 1 बिश्वा हिस्सा दिया था।
निर्माण में लगे थे 11 साल
इस चर्च के निर्माण में पूरे 11 साल लगे। 1875 में यह बनकर तैयार हो पाया था। 24 अक्टूबर 1875 को आगरा के विकार ऐपेस्टोलिक, डॉ. पॉल जोसी ओएफएम, फादर रफेल, फादर नोबर्ट, तत्कालीन बेगम और बोरबोन परिवार के सदस्यों की उपस्थिति में चर्च का उद्घाटन हुआ था। चर्च की इमारत के अंदर ऑल्टर के ठीक सामने राजकुमारी इसाबेला की कब्र है। इसके अलावा बोरबोन परिवार के कुछ और सदस्यों की कब्र भी यहां पर मौजूद है। इस परिवार के उत्तराधिकारी आज भी जहांगीराबाद में निवासरत हैं। 1963 में चर्च का जीर्णोद्धार किया गया। इसके बाद इसे कैथेड्रल (महाचर्च) का दर्जा दिया गया। नवाब काल में ब्रिटिश सैन्य छावनी सीहोर में थी। वहां के कई अफसर भी इस चर्च में प्रार्थना करने आते थे।
विशेषताएं
- खिड़कियां और रोशनदान इस तरह बनाए गए हैं कि सूर्य की रोशनी इसमें हर तरफ से आती है।
- यहां एक बार में लगभग 500 लोग प्रार्थना-सभा में शामिल हो सकते हैं। उनके बैठने के लिए लकड़ी की बैंच रखी गई हैं।
चर्च के परिसर में एक छोटा-सा फव्वारा लगा है।
- वर्ष 2012-13 इस चर्च के आर्चडायसिस बनने का गोल्डन जुबली ईयर था। इसमें शामिल होने कई जगह से बिशप, प्रीस्ट, सिस्टर्स और ईसाई धर्मावलंबी आए थे।
- फादर माइकल के अनुसार चर्च की स्थापना के बाद कुछ वर्षों तक यहां रोज प्रार्थना सभा नहीं होती थी। उस दौरान यहां प्रार्थना कराने के लिए आगरा, पटना, इंदौर आदि जगह से बिशप आते थे।
Published on:
21 Dec 2017 04:09 pm
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