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सरकार बनाने के पीछे कांग्रेस का इंदिरा भवन से जुड़ा ये खास राज! नहीं जानते होंगे आप

सत्ता में आने से पहले या बाद में यानि आज तक खोला @Top secrets of Congress ही नहीं गया...

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सरकार बनाने में कांग्रेस का इंदिरा भवन से जुड़ा ये राज! नहीं जानते होंगे आप

भोपाल@अरुण तिवारी की रिपोर्ट...

मध्यप्रदेश में करीब 15 साल वनवास के बिताने के बाद अब कांग्रेस वापस सत्ता में आसीन हो गई है। वहीं जब से कांग्रेस का भोपाल स्थित पीसीसी कार्यालय इंदिरा भवन में शिफ्ट Top secrets of Congress हुआ था, तभी से कांग्रेस सत्ता से दूर रही।

ऐसे में इंदिरा भवन से जुड़ा एक ऐसा खास राज है, जिसे सत्ता में आने से पहले या बाद में यानि आज तक खोला ही नहीं गया। जिसके कारण ये राज आज तक राज Secrets of Congress ही बना रहा। लेकिन आज हम आपको ये ऐसा राज बताने जा रहे हैं, कहते हें जिसने कांग्रेस के सत्ता में वापसी का रास्ता खोला।

दरअसल पिछले दिनों इंदिरा भवन के वास्तुदोषों में सुधार की कई बातें चर्चा में रहीं, इस दौरान जहां प्रवक्ताओं कक्षों के बाथरुम को तक तोड़ा गया वहीं एक खास राज छिपा लिया गया।

कांग्रेस से जुड़े सूत्रों के अनुसार वास्तु की तकरीबन हर बात तो सामने आई, लेकिन मुख्य कारण जो सत्ता में नहीं आने का बताया जाता था, उसे लेकर कहीं कोई चर्चा नहीं हुई।

सूत्रों के अनुसार इंदिरा भवन में बेसमेंट में जाने का एक स्लैब था, जो सीधे एक गढ़्ढ़े नुमा स्थान पर पश्चिम दिशा @VastuShastra में उतरता था, इसी को लेकर वास्तुशात्रियों ने मुख्य आपत्ति दर्ज कराई थी। खबरों में वास्तु ठीक करने से जुड़ी हर बात आई, लेकिन इस स्लैब से जुड़ी किसी भी तरह की सूचना बाहर नहीं आ सकी।

वहीं सत्ता के लिए छटपटा रही कांग्रेस ने बिना देर किए वास्तुशात्रियों vastu shastra की बात मानते हुए तुरंत इस स्लैब को न केवल तुड़वाया, बल्कि उस गढढ़े को भी भरवा दिया। बताया जाता है कि इसी के बाद कांग्रेस सरकार में आने को लेकर आश्वस्थ हुई थी।

और इसके बाद हुए चुनाव में जैसा कि वास्तुशात्रियों @VastuDosh द्वारा बताया गया था कांग्रेस मध्यप्रदेश में सबसे बड़ी पार्टी बन कर सामने आई। और इसके बाद ही सत्ता की चाबी उसके हाथ लगी।

पहले ये सूचना हुई थी सार्वजनिक...
कांग्रेस ने पिछले दिनों विधानसभा चुनाव से पहले इंदिरा भवन का वास्तु ठीक कराया था। पार्टी दफ्तर के सात टॉयलेट हटा दिए गए हैं। जानकारों के मुताबिक, वास्तुविदों की सलाह पर पार्टी दफ्तर के सात टॉयलेट्स हटा दिए गए हैं। इनमें से तीन ग्राउंड फ्लोर पर थे और चार तीसरी मंजिल पर।


उस समय पार्टी के मुख्य प्रवक्ता केके मिश्रा के कक्ष का टॉयलेट भी इनमें शामिल है। मिश्रा ने कहा कि यह वास्तु दोष था, अब देखना पार्टी को आशातीत उपलब्धियां हासिल होंगी। बता दें कि चार मंजिला इंदिरा भवन का 2006 में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उद्घाटन किया था।

गौरतलब है कि राज्य में इस साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं। साल 2003 में कांग्रेस जो सत्ता से दूर हुई तो वापसी के लिए अब तक संघर्ष कर रही है। पार्टी ने अपनी रणनीति भी बदली है। उसने खुद को सॉफ्ट हिंदुत्व की ओर मोड़ा है। बीते कुछ वर्षों से पार्टी मुख्यालय इंदिरा भवन हिंदू त्योहारों का साक्षी बनने लगा है।

चुनाव से पहले ही ये चर्चा थी कि अपने भाग्य को फिर से जगाने के लिए कांग्रेस ने वास्तु का सहारा लेने जा रही है। इसके बाद कांग्रेस ने अपनी पार्टी के राज्य मुख्यालय से 'वास्तु दोष' को हटाने का फैसला लिया। उसका मानना था कि यह कदम अच्छे भाग्य लाएगा और एक बार फिर मध्य प्रदेश में कांग्रेस सत्ता में आएगी। जो बाद में सही भी साबित हुआ।

कांग्रेस ने वास्तु शास्त्र विषेशज्ञों से परामर्श लेने के बाद राज्‍य की राजधानी भोपाल स्थित चार मंजिला कार्यालय परिसर 'इंदिरा भवन' में भूतल पर स्थित तीन शौचालय को हटा दिया गया है। आपको बता दें कि 'वास्तु शास्त्र' एक पारंपरिक हिंदू प्रणाली है, जिसका शाब्दिक अर्थ है 'वास्तुकला का विज्ञान'।

यहां भी छुपाया...
पूर्व में मध्यप्रदेश कांग्रेस के तत्कालीन प्रमुख प्रवक्ता केके मिश्रा ने बताया था कि हमने 'वास्तुशास्त्र' विशेषज्ञों से परामर्श किया और उनकी सलाह के अनुसार मेरे कमरे से जुड़े तीन शौचालयों को हटा दिया। एक अन्य कांग्रेस नेता ने कहा कि हमने वास्तु दोष को हटा दिया है। इससे बुरी शक्ति बाहर चली गई है। अब हमारे लिए चीजें बदलेंगी। वहीं इस दौरान भी स्लैब से जुड़ी किसी बात पर चर्चा नहीं की गई, जबकि सूत्रों के अनुसार वास्तुशात्रियों ने मुख्य आपत्ति इसी पर ली गई थी।

गौरतलब है कि इंदिरा भवन का उद्घाटन मार्च 2006 में पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने किया था। आगामी विधानसभा चुनावों के चलते कार्यालय कई गतिविधियों का केंद्र बना हुआ है, लेकिन इंदिरा भवन में कांग्रेस कार्यालय के शिफ्ट होने के बाद से ही कांग्रेस भी मध्यप्रदेश की सत्ता के बाहर ही बनी हुई थी।