16 जनवरी 2026,

शुक्रवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

Mob Lynching पर कविता लिख सोशल मीडिया सेंसेशन बना MP का यह आईआईटीयन

जानिए, मॉब लिंचिंग पर कविता लिख सोशल मीडिया सेंसेशन बने नवीन चौरे कौन है.

3 min read
Google source verification
01_4.png

भोपाल/ मध्यप्रदेश के कई लोग रातोंरात इंटरनेट सेंसेशन बन गए हैं। कभी कोई स्टाइल को लेकर तो कभी कोई गाने को लेकर। लेकिन मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले का रहने वाला एक आईआईटीयन अपनी कविता को लेकर सोशल मीडिया पर छा गया है। दिल्ली आईआईटी से बीटेक करने वाले नवीन चौरे ने मॉब लिंचिंग पर एक कविता लिखी है। नवीन की कविता की अब सोशल मीडिया पर खूब चर्चा है।

नवीन ने यह कविता देश में लगातार घट रही मॉब लिंचिंग की घटनाओं के बाद लिखी है। जुलाई महीने में नवीन की यह कविता यूट्यूब पर अपलोड हुई थी। जिसे लाखों लोगों ने सुना है। अब नवीन की कविता पाठ वायरल हो रही है तो उन्होंने कई चैनलों पर इंटरव्यू दिया है। साथ ही नवीन ने बताया है कि वह क्यों इस क्षेत्र में आए हैं। नवीन का बैक ग्राउंड साहित्यिक तो नहीं है। लेकिन उन्होंने गलत के खिलाफ आवाज बुलंद करने के लिए कविता को चुना है। जिसके जरिए अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हैं।

होशंगाबाद से हूं
एक इंटरव्यू के दौरान जब नवीन चौरे से पूछा गया कि आईआईटी और कविता बिल्कुल एक दूसरे उलट हैं। कैसे ये हो गया ये सब। इस पर नवीन ने कहा कि वो बीच के दौर था, जब मैं उस तरफ चला गया। क्योंकि मैं जिस जगह से आता हूं, वहां कुछ ज्यादा ऑप्शन नहीं था। इसलिए बारहवीं के बाद इंजीनियरिंग ही करनी थी। मैं मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले का रहने वाला हूं। परिवार के सभी लोग वहीं पर रहते हैं। मुझे साइंस अच्छा लगता है।

नवीन चौरे ने बताया कि मैं जब आईआईटी में था, तब भी नुक्कड़ नाटक करता था। मेरे परिवार में दूर-दूर तक इस बैकग्राउंड से कोई नहीं था। दादा जी किसान थे, मेरे पिताजी पहले ऐसे व्यक्ति परिवार से थे जो घर से बाहर निकले थे। हां मेरी बड़ी बहन को जरूर लिखने पढ़ने का शौक था। शायद मैं उसी से सीखा। साथ ही गजलें सुन-सुनकर मुझे बहुत सारी चीजें याद हो गईं।

मॉब लिंचिंग के दर्द को उकेरा
वहीं, नवीन चौरे ने जिस अंदाज में इस कविता को पढ़ा है। उसे पीड़ितों के दर्द और समाज के हालात को बयां किया है। साथ ही नवीन चौरे ने कहा कि मैं किसी राजनीतिक दल को टारगेट नहीं कर रहा हूं और न ही मैंने उनके लिए लिखा है। ये सिर्फ समाज को जागरूक करने के लिए हैं। ऐसा करने वाले लोग समाज से ही आते हैं।

ये है कविता
इक सड़क पे खून है
तारीख तपता जून है
एक उंगली है पड़ी
और उसपे जो नाखून है
नाखून पे है इक निशां
अब कौन होगा हुक्मरान
जब चुन रही थीं उंगलियां
ये उंगली भी तब थी वहां
फिर क्यों पड़ी है खून में
जिस्म इसका है कहां?
मर गया के था ही ना?
कौन थे वो लोग जिनके हाथ में थी लाठियां?
कोई अफसर था पुलिस का?
न्यायाधीश आए थे क्या?
कौन करता था वकालत?
फैसला किसने दिया?
या कोई धर्मात्मा था?
धर्म के रक्षक थे क्या?
धर्म का उपदेश क्या था?
कौन थे वो देवता?
न पुलिस न पत्रकार
नागरिक हूं जिम्मेदार