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भाजपा-कांग्रेस के बागी ही देंगे विंध्य-चंबल में टक्कर, बसपा ने दिग्गजों को मैदान में उतारा

विंध्य-चंबल में सामान्य जातियों के प्रत्याशी भी बसपा से जीतते रहे, दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग भी इन अंचलों में बसपा को करता है सपोर्ट  

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तीसरे मोर्चे के रूप में बहुजन समाज पार्टी पिछले 33 साल से स्थायी वोटबैंक के साथ अपनी उपस्थित कायम रखे हुए है। पिछले 7 चुनावों में ग्वालियर-चंबल, विंध्य और बुंदेलखंड की 40 सीटों पर बसपा की भूमिका निर्णायक रही है। भले ही ये सीटें पार्टी हर बार जीत न पाए, लेकिन सोशल इंजीनियरिंग के जरिए वह कांग्रेस-भाजपा दोनों ही पार्टियों के हार का कारण बनती रही है। इन तीन अंचलों में 26 सीट ऐसी हैं, जिस पर बसपा अपने कोर वोट बैंक के जरिए दोनों ही पार्टियों को पटखनी देने में कामयाब रही है। चंबल अंचल में 13 सीटों पर भले ही पार्टी किसी सीट पर लगातार कब्जा ना जमाए रख पाई हो, लेकिन एक ना एक बार कामयाब जरूर रही है।

1998 में 11.39 प्रतिशत वोट शेयर मिला

वर्ष-2108 के चुनाव में अनुसूचित जनजाति की 18 सीटें कांग्रेस और 17 भाजपा ने जीती थीं। पिछले 6 चुनाव की बात करें तो सबसे ज्यादा 1998 में 11.39 प्रतिशत वोट शेयर मिला था, तब पार्टी ने 11 सीट जीती थी। इसमें 6 सीटें ग्वालियर-चंबल में, 2 विंध्य और 3 छग में थी। बसपा का औसतन वोट बैंक 9 फीसदी रहा है, 2018 में यह 5 फीसदी पर आ गया था। हालांकि, 8 विधायक पार्टी से टूटकर कांग्रेस में शामिल हो गए थे। इसके बाद बसपा फिर ऐसी कामयाबी कभी नहीं दोहरा पाई। 2003 में पार्टी ने 2 और 2008 में 7 सीटों पर जीत हासिल की। इसमें तीन तीन ग्वालियर-चंबल, 4 विंध्य में थी।

इस बार भाजपा-कांग्रेस के बागी देंगे टक्टर

कांग्रेस इस बार फिर भाजपा-कांग्रेस के बागी टक्कटर देते नजर आएंगे। इसमें नागौद से पूर्व विधायक यादवेंद्र सिंह, लहार से भाजपा के पूर्व विधायक रसाल सिंह, सतना से भाजपा नेता रत्नाकरण चतुर्वेदी, मुंगावली से मोहन सिंह यादव को टिकट दिया है। वहीं, पूर्व मंत्री और भाजपा विधायक रहे रुस्तम सिंह के बेटे राकेश सिंह को मुरैना से कांग्रेस से बसपा में आए पूर्व मंत्री लाखन सिंह यादव को सेवड़ा से टिकट दिया गया है। राजनीतिक विश्लेषक और लेखक गिरिजा शंकर के अनुसार 1990 के दशक में बसपा मप्र में काफी मजबूत रूप में नजर आई, लेकिन वो अपने संगठन को उतनी मजबूत नहीं कर पाई। उत्तर प्रदेश, बिहार और पंजाब में दलितों की पार्टी मानी जाती है, लेकिन मप्र में ऐसा नहीं है। यहां दलितों के साथ अन्य पिछड़ा वर्ग भी इससे जुड़ा है। ऐसे में विंध्य और चंबल में इन दोनों वर्गों का वोट मिलता है। इस पार्टी से सामान्य उम्मीदवार भी जीतते हैं। विंध्य और चंबल में प्रत्याशी की जाति का अपना अलग प्रभाव है, ऐसे में पार्टी को कुछ सीटों पर सफलता मिलती है। भाजपा और कांग्रेस से बगावत कर आए नेताओं का अपना जनाधार है, यदि वे जीतते हैं तो इसका फायदा बसपा को होगा।

विंध्य और चंबल में जीतीं 4 सीटें

2013 में बसपा ने 4 सीट जीतीं। अंबाह से सत्यप्रकाश ने भाजपा के बंशीलाल जाटव को, दिमनी से बलवीर सिंह दंडौतिया ने कांग्रेस के रवीन्द्र सिंह तोमर को, रैगांव से उषा चौधरी ने भाजपा के पुष्पराज बागरी को, मनगंवा से शीला त्यागी ने भाजपा की पन्नाबाई प्रजापित को हराया था। वहीं, श्योपुर से बाबू झंडेल सिंह को 31.18, सुमावली से अजब सिंह कुशवाहा को 30.90, मुरैना से रामप्रकाश को 39.31, भिंड से संजीव सिंह संजू को 36.30, महाराजपुर से राकेश पाठक को 23.96, पन्ना से लोधी महेन्द्र पाल वर्मा को 17.69, रामपुर बघेलान से रामलखन सिंह 31.50, सेमरिया से पंकज सिंह को 25.16, देवतालाब से विध्यावती पटेल को 26.85, रीवा से कृष्णकुमार गुप्ता को 20.05, कटंगी से उदयसिंह पंचेश्वर गुरुजी को 26.93 प्रतिशत वोट मिले और दूसरे स्थान पर रहे।

6 सीटों पर दूसरे नंबर पर रही पार्टी

2018 में पार्टी ने भिंड और पथरिया से जीत हासिल की थी। भिडं से संजीव कुशवाह ने चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी और पथरिया में रामाबाई सिंह ने भाजपा के लाखन पटेल को मात दी थी। वहीं, सबलगढ़ में लाल सिंह केवट को 29.91, जौरा में मीनाराण धाकड़ को 25.14, ग्वालियर ग्रामीण में साहब सिंह गुर्जर को 31.86 प्रतिशत वोट मिले थे। यहां भाजपा के भारत सिंह कुशवाह से महज 1517 वोटों से हारे थे। पोहरी में कैलाश कुशवाह को 32.22 प्रतिशत, रामपुर बाघेलन में रामलखन सिंह पटेल को 26.69, देवतालाब में सीमा सिंह सेंगर को 32.43 वोट मिले थे। इन 6 सीटों पर पार्टी दूसरे नंबर पर रही थी।