श्रावण विशेष: आज भी एक बड़ा रहस्य है पूरब का सोमनाथ...

मध्यकालीन एक प्रसिद्ध व रहस्यों से भरा शिव मंदिर...

By: दीपेश तिवारी

Published: 28 Jul 2018, 12:40 PM IST

भोपाल। देश का हृदय यानि मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से करीब 32 किलोमीटर दूर भोजपुर (Bhojpur) नामक एक स्थान स्थित है। यहां मध्यकालीन एक प्रसिद्ध व रहस्यों से भरा शिव मंदिर है, जो भोजपुर शिव मंदिर (Bhojpur shiv Temple) या भोजेश्वर मंदिर (Bhoj Temple) के नाम से प्रसिद्ध हैं। इसे पूरब का सोमनाथ भी कहा जाता है।

भोजपुर को भले ही आज काफी कम लोग ही जानते हैं, लेकिन कहा जाता है कि मध्यकाल में इस नगर की प्रसिद्धि काफी दूर-दूर तक फैली थी। इस नगर को धार के राजा भोज ने स्थापित करवाया था।

पूरब का सोमनाथ मंदिर...
जानकारों के अनुसार इस मध्यकालीन नगर को प्रसिद्धि दिलाने मुख्य श्रेय भोजपुर के भोजेश्वर शिव मंदिर Mysterious Temple of Lord Shiv in india और यहां निर्मित एक विशाल झील का था। राजा भोज द्वारा बनवाए गए इस मंदिर की प्रसिद्धि 'पूरब के सोमनाथ मंदिर' के रूप में थी।

रहस्य जो आज तक नहीं खुल सका...
शिवलिंग की ऊंचाई 7.5 फीट और परिधि 17.8 फीट है, जो स्थापत्य कला का एक बेमिसाल नमूना है। यह शिवलिंग एक वर्गाकार और विस्तृत फलक वाले चबूतरे पर त्रिस्तरीय चूने-पत्थर की पाषाण-खंडों पर स्थापित है।

कहते हैं इस मंदिर का शिखर निर्माण का काम कभी भी पूर्ण नहीं हो सका था। शिखर को पूरा करने के लिए जो भी प्रयास किए गए, उसके अवशेष अब भी यहां बड़े-बड़े पत्थर के रूप में बिखड़े हुए हैं। मंदिर का शिखर क्यों नहीं बन पाया इस रहस्य lord shiv mysterious temple को कोई नहीं जानता है।

ये हैं खास विशेषताएं...
भोजपुर तथा इस शिव मंदिर का निर्माण परमार वंश के प्रसिद्ध राजा भोज (1010 ई - 1055 ई ) द्वारा किया गया था। इस मंदिर कि अपनी कई विशेषताएं हैं।

1. इसका विशाल शिवलिंग हैं जो कि विश्व का एक ही पत्थर से निर्मित सबसे बड़ा शिवलिंग (World's Tallest Shiv Linga) हैं। सम्पूर्ण शिवलिंग कि लम्बाई 5.5 मीटर (18 फीट ), व्यास 2.3 मीटर (7.5 फीट ), तथा केवललिंग कि लम्बाई 3.85 मीटर (12 फीट ) है।

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2. भोजेश्वर मंदिर (Bhoj Temple) के पीछे के भाग में बना ढलान है, जिसका उपयोग निर्माणाधीन मंदिर के समय विशाल पत्थरों को ढोने के लिए किया गया था। पूरे विश्व में कहीं भी अवयवों को संरचना के ऊपर तक पहुंचाने के लिए ऐसी प्राचीन भव्य निर्माण तकनीक mysterious temple in india उपलब्ध नहीं है। ये एक प्रमाण के तौर पर है, जिससे ये रहस्य खुल गया कि आखिर कैसे 70 टन भार वाले विशाल पत्थरों का मंदिर क शीर्ष तक पहुचाया गया।

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3. भोजेश्वर मंदिर (Bhoj Mandir) कि तीसरी विशेषता इसका अधूरा निर्माण हैं। इसका निर्माण अधूरा क्यों रखा गया इस बात का इतिहास में कोई पुख्ता प्रमाण तो नहीं है पर ऐसा कहा जाता है कि यह मंदिर एक ही रात में निर्मित होना था परन्तु छत का काम पूरा होने के पहले ही सुबह हो गई, इसलिए काम अधूरा रह गया।

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4. भोजेश्वर मंदिर (Bhojeshwar Temple) कि गुम्बदाकार छत हैं। चुंकि इस मंदिर का निर्माण भारत में इस्लाम के आगमन के पहले हुआ था अतः इस मंदिर के गर्भगृह के ऊपर बनी अधूरी गुम्बदाकार छत भारत में ही गुम्बद निर्माण के प्रचलन को प्रमाणित करती है। भले ही उनके निर्माण की तकनीक भिन्न हो। कुछ विद्धान इसे भारत में सबसे पहले गुम्बदीय छत वाली इमारत मानते हैं। इस मंदिर का दरवाजा भी किसी हिंदू इमारत के दरवाजों में सबसे बड़ा है।

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5. इस मंदिर की पांचवी विशेषता इसके 40 फीट ऊंचाई वाले इसके चार स्तम्भ हैं। गर्भगृह की अधूरी बनी छत इन्हीं चार स्तंभों पर टिकी है।

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6. इस मंदिर की छठवीं विशेषता ये है कि इसके अतिरिक्त भूविन्यास, सतम्भ, शिखर , कलश और चट्टानों की सतह पर आशुलेख की तरह उत्कीर्ण नहीं किए हुए हैं। भोजेश्वर मंदिर (Bhojeshwar Temple) के विस्तृत चबूतरे पर ही मंदिर के अन्य हिस्सों, मंडप, महामंडप तथा अंतराल बनाने की योजना थी। ऐसा मंदिर के निकट के पत्थरों पर बने मंदिर- योजना से संबद्ध नक्शों से पता चलता है।

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इस प्रसिद्ध स्थल में वर्ष में दो बार वार्षिक मेले का आयोजन किया जाता है जो मकर संक्रांति व महाशिवरात्रि पर्व के समय होता है। इस धार्मिक उत्सव में भाग लेने के लिए दूर दूर से लोग यहां पहुंचते हैं। महाशिवरात्रि पर यहां तीन दिवसीय भोजपुर महोत्सव का भी आयोजन किया जाने लगा है।

7. पार्वती कि गुफा (Cave of Parvati)
भोजपुर शिव मंदिर(Bhojpur Shiv Temple) के बिलकुल सामने पश्चमी दिशा में एक गुफा हैं यह पार्वती गुफा के नाम से जानी जाती हैं। इस गुफा में पुरातात्विक महत्तव कि अनेक मूर्तिया हैं।

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इसके अलावा भोजपुर (Bhojpur) में एक अधूरा जैन मंदिर भी है। इस मंदिर में भगवन शांतिनाथ कि 6 मीटर ऊंची मूर्ति हैं। दो अन्य मुर्तिया भगवान पार्शवनाथ व सुपारासनाथ कि हैं। इस मंदिर में लगे एक शिलालेख पर राजा भोज का नाम लिखा है। यह शिलालेख एक मात्र Epigraphic Evidence हैं जो कि राजा भोज से सम्बंधित हैं। इसी मंदिर परिसर में भक्तांबर स्त्रोत लिखने वाले आचार्य माटूंगा का समाधि स्थल भी है।

वहीं मंदिर क्षेत्र में कई पत्थर आज भी उस समय हो रहे भव्य मंदिर निर्माण की गाथा कहते प्रतीत होते हैं। इसके अलावा कई जानकार ये भी मानते हैं कि मंदिर का बहुत ही साइंटिफिक तरीके से निर्माण किया गया। इसके बारे में वे यहां लगे पिलर्स का भी उदाहरण देते हैं।

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