6 फ़रवरी 2026,

शुक्रवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

नाट्य मंडली ने स्वांग शैली में सुनाई विद्रोह की दास्तां

शहीद भवन में नाटक 'कारतूस-1857 क्रांति' का मंचन  

2 min read
Google source verification
नाट्य मंडली ने स्वांग शैली में सुनाई विद्रोह की दास्तां

नाट्य मंडली ने स्वांग शैली में सुनाई विद्रोह की दास्तां

भोपाल। शहीद भवन में गुरुवार को नाटक 'कारतूस-1857 क्रांति' का मंचन हुआ। नाटक का लेखन, परिकल्पना और निर्देशन दिनेश नायर का रहा। नाटक का यह पहला शो है। नाटक में सूत्रधार की भूमिका में विष्णु भट्ट का किरदार है। उन्होंने इस क्रांति के आंखों देखे हाल पर मांझा प्रवास नामक किताब लिखी थी।

डायरेक्टर का कहना है कि अधिकांश किताबों में एक नाट्य मंडली का जिक्र मिलता है जो ग्वालियर से झांसी तक गई थी। ये मंडली लोगों में आंदोलन की अलख जगाती है। स्वांग शैली में खेले गए एक घंटे 55 मिनट के इस नाटक में 15 किरदार ऑनस्टेज हैं। जो पूरे समय मंच पर रहकर अलग-अलग किरदार निभाते हैं।

कारतूस से शुरू हुआ था आंदोलन

नाटक में दिखाया गया कि अंग्रेजों केहिंदुस्तान पर अत्याचारों के विरुद्ध आंदोलन बंदूक की कारतूस से शुरू हुआ। सैनिक विद्रोह जनमानस को साथ लिए अवध तक जा पहुंचता है। इसका प्रमुख नायक जो की 1857 काल का आम आदमी है जो उस वक्त 12 साल का था और जलियांवाला बाग में 13 अप्रैल 1919 बैसाखी के दिन में जब ह्त्याकांड होता है और एक 12 साल के बच्चे को शहीदों के खून से सनी मिट्टी उठा कर माथे से लगा कर अंग्रेजों से मुक्ती के लिए कसम खाता देख, अपना 1857 संघर्ष के दिनों की कहानी सुनाता है।

यह क्रांति इतिहास की एक विभाजन रेखा है। इसे केवल सैन्य विद्रोह नहीं कह सकते। क्योंकि जिन लोगों ने दिल्ली कूच किया वह समाज के हर वर्ग से आए थे। यह व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह था। इस विद्रोह के बाद भारतीय और अंग्रेज दोनों की विचारधारा में परिवर्तन आया। भारतीय और राष्ट्रवादी हुए और अंग्रेज और प्रतिरक्षात्मक। लार्ड डलहोजी ने डाक्ट्रिन ऑफ लैप्स के कानून के अन्तर्गत यदि क्षेत्र का राजा निसन्तान मर जाता है या शासक कंपनी की दृष्टि में अयोग्य साबित होता है।

लार्ड डलहोजी और उसके उत्तराधिकारी लार्ड कैन्निग ने सतारा,नागपुर, झांसी, अवध को कंपनी के शासन में मिला लिया। जनरल हैवलाक की फौज ने 3000 लोगों को फांसी दी। नाटक में अंग्रेजों के अत्याचार के विरुद्ध जनता का विद्रोह, नाना साहब की सभा, मेरठ की छावनी में सैनिक विद्रोह, रानी लक्ष्मी बाई, तात्या टोपे, अंग्रेजों का मजाक उड़ाता आमजन का स्वांग, कहानी में 1763 का सन्यासी विद्रोह, उसके बाद किसानों, बुनकरों, जनजातियों, देशी पलटनों इतने के विद्रोह से अंग्रेजों का भोंचक रह जाना जैसे दृश्य शामिल किए गए।

भारत विविधताओं की महाभूमि

नाटक में दिखाया गया कि राष्ट्र का मतलब एक सा खून नहीं, एक सा वर्ण नहीं, एक सा धर्म नहीं, एक सी जाती नहीं, बल्कि अपनी-अपनी ऐतिहासिक विरासत से जीवंत जुड़ाव और एक-दूसरे से लगाव है। राष्ट्रीयता की जो विचारधारा हमने स्वतंत्रता महासंग्राम से धरोहर के रूप में पाई, उसके कुछ बिरले मौलिक तत्व थे।

विभिन्नताओं के बीच एक सूत्र में बंधे रहने की सनातन अंत:चेतना और आध्यात्मिक संस्पर्शों का लगातार पोषण करते रहना होगा। इन्हीं विविधताओं को देख कर भारत के आगे मैक्समूलर का मस्तक झुक जाता है और जिसके अतीत के गौरव को ह्वेन त्सांग, फाहियान, मेगस्थनीज जैसे विदेशी यात्रियों ने सारे विश्व को बताया था कि भारत विविधताओं की महाभूमि है।