भोपाल

लुप्तप्राय हनी बेजर को बचाने की सुध नहीं

- कोलार रोड के जंगलों में मौजूद हैं शेर से भी टक्कर लेने वाले जीव हनी बेजर- इन जीवों को भी बना हुआ रात में प्रतिबंधित वन क्षेत्र से गुजरने वाले भारी वाहनों से खतरा

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Dec 09, 2019
लुप्तप्राय हनी बेजर को बचाने की सुध नहीं

भोपाल. देश से लुप्तप्राय वन्यजीव हनी बेजर का जोड़ा राजधानी के नजदीक रातापानी सेंक्चुरी में देखा जा चुका है। बताया गया है कि यह जीव सबसे पहले अक्टूबर 2014 में दिखाई दिया था। वन विभाग के कर्मचारियों का कहना है कि इस जीव का फोटो टै्रप कैमरे में भी कैद हो चुका है।

बिज्जू की प्रजाति के इस जीव की संख्या पिछले डेढ़ दशक में तेजी से कम हुई है। इसलिए इसे विलुप्त वन्यजीवों की श्रेणी में रखा गया है। वन अधिकारी बताते हैं कि यह जीव मस्टेलिडाए कुल और मेलिवोरा प्रजाति का है। इन जीवों का शिकार इनकी खाल, फर के लिए किया जाता रहा। इन पर तांत्रिक क्रियाएं करने की बात भी लोग बताते हैं।

हनी बेजर को गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉड्र्स में मोस्ट फियरलेस क्रीचर के नाम से दर्ज किया गया है। यह बेहद खूंखार, निडर, बुद्धिमान और चालाक जीव होता है। एक शोध के दौरान जब हनी बेेजर को बंद किया गया तो दरवाजे की कुंडी खोलकर, पत्थर, मिट्टी या कोई डंडा आदि दीवार के पास रखकर उसपर चढ़कर निकल भागते हैं। ये जमीन खोद सुरंग बनाकर भी निकल भागता है। यह पहले परिस्थिति का एनालाइज करता है और फिर निकल भागने के लिए प्लानिंग करता है और इस तरह निकल भागता है, जैसे कोई इंसान निकल भागे।


हनी बेजर देखने में नेवला और भालू का मिलाजुला रूप होता है। इसके शरीर का ऊपरी भाग सफेद और पेट एवं बगल का रंग काला होता है। इसके पूरे शरीर पर लंबे-लंबे बाल और पैरों में लंबे नुकीले नाखून होते हैं। यह शहद को शौक से खाता है। यह सर्वभक्षी (फल-मूल से लेकर कीट-पतंगे तक) प्राणी है। यह स्वभाव से झगड़ालू होता है। इस कारण खूंखार जानवर भी इस पर हमला करने से बचते हैं।

अफ्रीका, मिडिल ईस्ट और भारत में पाया जाने वाला यह जीव सबकुछ खा जाता है। फल-फूल, दीमक, छोटे जीव-जंतु, खरगोश, चूहा, सांप, बिच्छू, यहां तक कि कब्र खोदकर मुर्दों को भी खा जाता है। वाटर बॉडीज के किनारों पर 25-30 फीट लंबी मांद में रहता है।

यह खुद का घर नहीं बनाता और लोमड़ी, सियार आदि जीवों को खदेड़कर उनके घर पर कब्जा कर लेता है। बेहद गुस्सैल और झगड़ालू स्वभाव होने के कारण शेर, तेंदुए भी इससे टक्कर लेने से डरते हैं। इसकी बॉडी एंटी वीनम होने के साथ-साथ खाल इतनी मोटी और सख्त होती है कि सांप के डसने और बिच्छू के डंक का कोई असर नहीं होता और उन्हें मारकर खा जाता है। इसका शरीर रोएंदार और खुरदरा होता है। टांगे छोटी और मजबूत होती हैं। आंखें और कान छोटे होने पर भी देखने और सुनने की गजब की क्षमता होती है।

जमीन के नीचे जरा सी हलचल या जानवर की गंध से ही शिकार को लोकेट कर लेता है। मधुमक्खी के छत्ते को तोड़कर शहद खा जाता है। इसे मधुमक्खी के डंक का भी कोई असर नहीं होता। इंसान को भी इस जानवर से भिडंत नहीं करनी चाहिए।

टाइगर रिजर्व बनने से बढ़ेगी सुरक्षा
सुन्दर सागौन (टीक) वनों के लिये प्रसिद्ध रातापानी सेंक्चुरी 890 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। इसमें बाघ, तेंदुआ, जंगली कुत्ते, स्लॉथ बीय, शियार, लोमड़ी, चीतल, सांभर, नीलगाय, चिंकारा, चौसिंघा, हनुमान लंगूर, आदि वन्यजीव हैं। 40 टाइगर की आबादी के चलते प्रदेश सरकार ने इसे टाइगर रिजर्व बनाने की घोषणा की है।

टाइगर रिजर्व के लिए रायसेन, सीहोर तथा भोपाल जि़लों का लगभग 3,500 वर्ग किमी का क्षेत्र बाघों के लिये आरक्षित किया गया है। 1,500 वर्ग किमी. क्षेत्र को कोर क्षेत्र के रूप में जबकि 2,000 वर्ग किमी को बफर जोन के रूप घोषित किया जायेगा। टाइगर रिजर्व बनने से अवैध खनन और टाइगर समेत अन्य वन्यजीवों के शिकार पर भी रोक लग सकेगी।

रातापानी में कितने इस प्राणी को कबर बिज्जू के नाम से जाना जाता है। इनकी संख्या के बारे में सटीक जानकारी पता कर बताई जा सकती है।
- एके सिंह, डीएफओ, रातापानी


करीब तीन-चार दशक पहले तक इन प्राणियों का शिकार उनके खाल और फर के लिए किया जाता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है। भोपाल वन वृत्त में ये जीव पहले की तरह दिखते हैं। इनके कंजर्वेशन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
- रवीन्द्र सक्सेना, सीसीएफ, भोपाल वन वृत्त

Updated on:
09 Dec 2019 01:11 pm
Published on:
09 Dec 2019 12:32 pm
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