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राजधानी में 25 साल में आधी रह गई विदेशी परिंदों की संख्या

अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस आज

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राजधानी में 25 साल में आधी रह गई विदेशी परिंदों की संख्या

भोपाल। भोपाल की हरियाली और बड़े तालाब को देख भले हर किसी को सुकून का अहसास हो, लेकिन अक्सर लोग जैवविविधता के महत्व पर ध्यान ही नहीं देते। महज बीस से पच्चीस साल पहले तक बड़े तालाब में यूरोप, रशिया, साइबेरिया और साउथ एशिया से पक्षियों की तीन सौ से ज्यादा प्रजातियां आती थी। धीरे-धीरे इनकी संख्या आधी हो गई है। अब कुछ ऐसा ही हाल बड़े तालाब के लिविंग सिस्टम का भी हो गया है। बायोडायवर्सिटी डे के मौके पर पत्रिका प्लस शहर के ऐसे चेहरों से रू-ब-रू करा रहा है जो जैवविविधता के महत्व के प्रति लोगों को जागरूक कर रहे हैं, ताकि हमारी यह संपदा लंबे समय तक रहे और आने वाली पीढिय़ों को भी मिल सके।

पथरीली जमीन पर रौपे पौधे

डीपी कनौजिया मध्यप्रदेश सहकारी भूमि विकास बैंक प्रबंधक पद से रिटायर्ड हैं। उनका कहना है कि 25 साल पहले उन्होंने रचना नगर में प्लॉट खरीदा तो पूरा इलाका पथरीला था। गर्मी के मौसम यहां खड़े रहना भी मुश्किल था। उन्होंने बैतूल, होशंगाबाद और रायसेन के जंगलों में ऐसे पौधों की खोज शुरू की जो पथरीली इलाके में पनप सके। साथ ही उनकी उम्र भी ज्यादा हो। एक के बाद एक उन्होंने इलाके में कई पेड़ लगाए। उनके जैवविविधता संरक्षण के काम को देखते हुए मंगलवार को जैवविविधता बोर्ड उन्हें प्रदेश स्तरीय सम्मान से सम्मानित भी करने जा रहा है।

जागरुकता के लिए छोड़ दी नौकरी

बायोडायवर्सिटी बोर्ड में स्टेट कार्डिनेटर रहे डीपी तिवारी ने दस साल पहले लोगों को जागरुक करने के लिए रिटायरमेंट लिया। वे सैकड़ों स्कूल और कॉलेज में स्टूडेंट्स को जैवविविधता का महत्व बता चुके हैं। पिछले दो साल में विभिन्न प्रजातियों के 27 हजार पौधों का रोपण किया है।

रिसर्च कर तालाब के लिए बनाई पॉलिसी

बायोसाइंस विभाग के एचओडी प्रो. विपिन व्यास ने 1991 में बड़े तालाब पर रिसर्च शुरू की। इसके बाद वे जैवविविधता को बचाने के लिए जुट गए। उन्होंने आसपास के इलाकों में रहने वाले लोगों को बताया कि तालाब एक पानी भर की ईकाई नहीं है बल्कि ये पूरा लिविंग सिस्टम है।

ग्रामीणों संग खोला सारस जैवविविधता केंद्र

मोहम्मद खालिक को पक्षियों से बहुत प्यार था। पक्षियों की कम होती संख्या देख उन्होंने बर्ड वॉचिंग कैंप शुरू किया। वे पंद्रह सालों में बर्ड वॉचिंग कैंप के माध्यम से एक लाख लोगों को पक्षियों की प्रजातियों से रू-ब-रू करा चुके हैं। ग्रामीणों की मदद से बिशनखेड़ी में सारस जैवविविधता केंद्र भी शुरू कराया।

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