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तीन फिल्मों के ऑफर मिले, दो डिब्बा बंद हो गईं तो एक में रिजेक्ट कर दिया गया

'द लास्ट शो' फिल्म की शूटिंग कर रहे एक्टर वर्धन पुरी

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तीन फिल्मों के ऑफर मिले, दो डिब्बा बंद हो गईं तो एक में रिजेक्ट कर दिया गया

तीन फिल्मों के ऑफर मिले, दो डिब्बा बंद हो गईं तो एक में रिजेक्ट कर दिया गया

भोपाल। एक्टिंग का शौक तो मुझे बचपन से ही था। मैंने पांच साल की उम्र में ही थिएटर ज्वॉइन कर लिया था। मेरे दादा अमरीश पुरी हमेशा कहते थे कि अच्छा अभिनेता बनने से पहले अच्छा इंसान बनो। वे कहते थे कि सिनेमा में बलराज साहनी और दिलीप कुमार की मूवी देखो, इससे नया सिखने को मिलेगा। यह कहना है एक्टर वर्धन पुरी का, जो फिल्म 'द लास्ट शो' की गौहर में शूटिंग कर रहे हैं। पत्रिका प्लस से बातचीत में उन्होंने कहा कि मैंने इंडस्ट्री में 'ये साली जिंदगी' से डेब्यू किया। हालांकि ये पहली फिल्म नहीं थी। इससे पहले तीन फिल्मों के ऑफर मिले, भट्ट कैंप की दो फिल्में डिब्बा बंद हो गई तो एक में अंतिम समय में रिजेक्ट कर दिया गया। इससे पहले यशराज बैनर में बतौर अस्सिटेंट डायरेक्टर काम किया।

एक्टिंग के बिना कोई टिक नहीं सकता
नेपोटिज्म से जुड़े सवाल पर उन्होंने कहा कि नेपोटिज्म फिल्म इंडस्ट्री से लेकर हर इंडस्ट्री में है। लेकिन यह मुझ पर लागू नहीं होता। क्योंकि मेरे दादा अमरीश पुरी मुझे किसी के ऑफिस लेकर नहीं गए। कभी मेरे लिए किसी डायरेक्टर को फोन नहीं किया। मैं स्ट्रग्ल कर नाम बनाने की कोशिश कर रहा हूं हालांकि उनके नाम का टैग तो हमेशा रहेगा। लेकिन इंडस्ट्री में पैर जमाने के लिए सिर्फ एक्टिंग ही काम आती है।

रात को रिर्हसल किए बिना सोते नहीं थे
दादा से जुड़े किस्सों पर वर्धन ने कहा कि उन्होंने कई नेगेटिव शेड्स वाले रोल जरूर किए, लेकिन फिल्मों से इतर आम जिंदगी में वे बहुत अलग इंसान थे। वे सुबह जल्दी उठकर पूजा-पाठ करते थे। वे बेहद धार्मिक थे। उनके रोल की बात करूं तो वे मुझे हमेशा बताते थे कि उनके हेयर डिजाइनर गोविंद और कॉस्ट्यूम डिजाइनर माधव उनके साथ रात-रातभर डिजाइनिंग का काम करते थे। उनके जूतों से लेकर विग तक वे फाइनल करते थे। वे रात-रात भर रिहर्सल किया करते थे और सुबह-5 बजे उठकर सेट पर चले जाते थे। भले ही रात-एक बजे घर लौटकर आए, लेकिन वे बिना रिहर्सल किए कभी सोते नहीं थे।