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ओशो का जन्म स्थान पर देश-विदेश से आए अनुयायी, केक काटकर मनाया जन्मदिन

साल में एक बार खुलता है ओशो के जन्म स्थान का कक्ष...

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ओशो का जन्म स्थान पर देश-विदेश से आए अनुयायी, केक काटकर मनाया जन्मदिन

ओशो का जन्म स्थान पर देश-विदेश से आए अनुयायी, केक काटकर मनाया जन्मदिन

भोपाल। ओशो की जन्मस्थली रायसेन के ग्राम कुचवाड़ा में बुधवार को ओशो के अनुयायी जुटने शुरू हो गए हैं। अपने भगवान का जन्मदिन मनाने के लिए देश-विदेश से अनुयायी कुचवाड़ा के उस घर में केक काटेंगे, जहां ओशो का जन्म 11 दिसंबर 1931 को हुआ था।

जन्मस्थान वाला कक्ष साल में एक बार 11 दिसंबर को ही खुलता है। अनुयायी इस कक्ष में मोमबत्ती जलाकर फूलों से सजाएंगे और केक काटा जाएगा।

अपने अद्वितीय बौद्धिक कौशल से भारत सहित पूरी दुनिया को अपने दर्शन से जोडऩे वाले आचार्य रजनीश ओशो का जन्मस्थल कुचवाड़ा खरगोन से आठ किलोमीटर दूर है।

उनका जन्म ननिहाल में हुआ था। रायसेन जिले की बरेली सिलवानी और उदयपुरा तहसीलों को जोडऩे वाला कुचवाड़ा गांव में भव्य ओशो तीर्थ आश्रम है। संस्थापक जापान के स्वामी सत्यतीर्थ भारती हैं। ओशो का जन्म स्थल होने के कारण कुचवाड़ा गांव अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त है। बुधवार को ओशो तीर्थ से ओशो के जन्म स्थल तक उनके अनुयायी नाचते-गाते आ रहे हैं।

रहस्यमयी रजनीश यानि ओशो :-
11 दिसंबर, 1931 को मध्य प्रदेश के कुचवाड़ा में उनका जन्म हुआ था। जन्म के वक्त उनका नाम चंद्रमोहन जैन था। बचपन से ही उन्हें दर्शन में रुचि पैदा हो गई। इसके बाद उन्होंने अपनी पढ़ाई जबलपुर में पूरी की और बाद में वो जबलपुर यूनिवर्सिटी में लेक्चरर के तौर पर काम करने लगे।

वहीं इसके बाद उन्होंने अलग-अलग धर्म और विचारधारा पर देश भर में प्रवचन देना शुरू किया। वे प्रवचन के साथ ध्यान शिविर भी आयोजित करना शुरू कर दिया। शुरुआती दौर में उन्हें आचार्य रजनीश के तौर पर जाना जाता था।

नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने नवसंन्यास आंदोलन की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने खुद को ओशो कहना शुरू कर दिया।

अमरीका प्रवास पर ओशो...
साल 1981 से 1985 के बीच वो अमरीका चले गए। यहां अमरीकी प्रांत ओरेगॉन में उन्होंने आश्रम की स्थापना की। ये आश्रम 65 हज़ार एकड़ में फैला था।

ओशो का अमरीका प्रवास बेहद विवादास्पद रहा। महंगी घड़ियां, रोल्स रॉयस कारें, डिजाइनर कपड़ों की वजह से वे हमेशा चर्चा में रहे।

ओरेगॉन में ओशो के शिष्यों ने उनके आश्रम को रजनीशपुरम नाम से एक शहर के तौर पर रजिस्टर्ड कराना चाहा, लेकिन स्थानीय लोगों ने इसका विरोध किया। इसके बाद 1985 वे भारत वापस लौट आए.

ओशो की मृत्यु
भारत लौटने के बाद वे पुणे के कोरेगांव पार्क इलाके में स्थित अपने आश्रम में लौट आए, इसके बाद उनकी मृत्यु 19 जनवरी, 1990 में हो गई।

उनकी मौत के बाद पुणे आश्रम का नियंत्रण ओशो के क़रीबी शिष्यों ने अपने हाथ में ले लिया। आश्रम की संपत्ति करोड़ों रुपये की मानी जाती है और इस बात को लेकर उनके शिष्यों के बीच विवाद भी रहा है।

मौत के दिन क्या हुआ
ओशो की मौत पर 'हू किल्ड ओशो' टाइटल से क़िताब लिखने वाले अभय वैद्य के अनुसार "19 जनवरी, 1990 को ओशो आश्रम से डॉक्टर गोकुल गोकाणी को फोन आया। उनको कहा गया कि आपका लेटर हेड और इमरजेंसी किट लेकर आएं।"

डॉक्टर गोकुल गोकाणी ने अपने हलफनामे में लिखा है, "वहां मैं करीब दो बजे पहुंचा। उनके शिष्यों ने बताया कि ओशो देह त्याग कर रहे हैं। आप उन्हें बचा लीजिए, लेकिन मुझे उनके पास जाने नहीं दिया गया। कई घंटों तक आश्रम में टहलते रहने के बाद मुझे उनकी मौत की जानकारी दी गई और कहा गया कि डेथ सर्टिफिकेट जारी कर दें।"

डॉक्टर गोकुल ओशो की मौत की टाइमिंग को लेकर भी सवाल खड़े करते हैं। डॉक्टर ने अपने हलफ़नामे में ये भी दावा किया है कि ओशो के शिष्यों ने उन्हें मौत की वजह दिल का दौरा लिखने के लिए दबाव डाला।

ओशो के आश्रम में किसी संन्यासी की मृत्यु को उत्सव की तरह मनाने का रिवाज़ था, लेकिन जब खुद ओशो की मौत हुई तो इसकी घोषणा के एक घंटे के भीतर ही उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया और उनके निर्वाण का उत्सव भी संक्षिप्त रखा गया था।