
भोपाल। पातालकोट का चट्टानी शहद और पन्ना का जंगली प्रजाति का छोटे आंवले प्राकृतिक गुणों से भरपूर है। इसे देश-विदेश में पहचान दिलाने के लिए वन विभाग ने पहल की है। वन विभाग ने इन्हें जियोग्राफिकिल इंडिकेशन (जीआई टैग) दिलाने के लिए आवेदन किया है। यदि सब कुछ ठीक रहा तो साल के अंत तक दोनों को टीआई टैग मिल सकता है। जीआई टैग मिलने के बाद दुनियाभर में इन दोनों उत्पादों को नई पहचान और अच्छा दाम मिल सकेगा।
शहद में शिलाजीत के अर्क की मौजूदगी
मप्र लघु वनोपज संघ के एएमडी डॉ. दिलीप कुमार के अनुसार छिंदवाड़ा के तामिया तहसील स्थित पातालकोट में पाई जाने वाली मधुमक्खियां अपने छत्ते पेड़ों के बजाए लटकती हुई पहाड़ी चट्टानों पर बनाती हैं। इनमें प्राचीन वनस्पतियों के फॉसिल दबे हुए हैं, जिनमें शिलाजीत भी पाया जाता है। यानी यहां के शहद में प्राकृतिक रूप से अतिरिक्त मिनरल होने के साथ ही शिलाजीत के अर्क की मौजूदगी भी पाई जाती है। जो पौरूषवर्धक और शक्तिवर्धक दवा है। यहां के जंगलों में 220 प्रकार के फूलों की प्रजातियां हैं। इससे शहद की गुणवत्ता और भी अच्छी होती है। भी तक इस शहद को भी जंगलों में मिलने वाले अन्य शहद के साथ मिक्स कर बेचा जाता था। शहद की जांच में शिलाजीत की मौजूदगी की पुष्टि होने के बाद अब इसे अलग से बेचने की तैयारी है।
हर साल 50 क्विंटल का उत्पादन
वहीं, पन्ना के जंगलों में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले छोटे आंवले में विटामिन सी सर्वाधिक मात्रा में पाया जाता है। इसका उपयोग च्यवनप्राश निर्माण के लिए बड़ी मात्रा में किया जा सकता है। इसके अलावा त्रिफला और मधुमेय चूर्ण के निर्माण के लिए भी यह सबसे अच्छा माना जाता है। यह छोटा आंवला डाइबिटीज की बीमारी में प्रीवेंटिव मेडिसिन के रूप में भी उपयोगी है। हर साल पन्ना के जंगलों से 50 क्विंटल तक आंवला उत्पादन होता है।
Published on:
27 Aug 2023 10:03 pm

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