
भोपाल। मिंटो हॉल में बुधवार को आयोजित कार्यक्रम में सीएम शिवराज सिंह चौहान ने ब्यूरोक्रेट्स पर ली चुटकी।
भोपाल। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मध्यप्रदेश के भोपाल और इंदार में पुलिस कमिश्नर प्रणाली को लागू करने का ऐलान कर दिया है। सरकार जल्द से जल्द यह प्रणाली लागू करना चाहती है। इसके लिए कैबिनेट से लेकर विधानसभा तक जाना होगा, लेकिन यदि सरकार जल्द इसे लागू करना चाहे तो कैबिनेट से मंजूरी के बाद अध्यादेश के जरिए भी इसे लागू कर सकती है। बीते करीब डेढ दशक से इसे लागू करने का प्रयास हो रहा है, लेकिन आईएएस व आईपीएस लॉबी के अप्रयत्क्ष टकराव के बाद हर बार यह मामला अटकता रहा है।
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शिवराज बोले- बढ़ती आबादी के कारण जरूरत...
सीएम शिवराज सिंह चौहान ने रविवार को कहा कि प्रदेश में कानून और व्यवस्था की स्थिति बेहतर है और पुलिस अच्छा काम कर रही है. उन्होंने कहा कि पुलिस और प्रशासन ने मिलकर कई उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन शहरी जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है, भौगोलिक दृष्टि से भी महानगरों का विस्तार हो रहा है और जनसंख्या भी लगातार बढ़ रही है, इसलिए कानून और व्यवस्था की कुछ नई समस्याएं पैदा हो रही हैं। उनके समाधान और अपराधियों पर नियंत्रण के लिए प्रदेश के दो सबसे अधिक जनसंख्या वाले शहरों भोपाल और इंदौर में पुलिस आयुक्त प्रणाली लागू कर रहे हैं। इससे अपराध पर और प्रभावी तरीके से नियंत्रण हो सकेगा।
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नई व्यवस्था में ये सबसे खास-
पुलिस कमिश्नर प्रणाली में सबसे अहम बदलाव ये आता है कि जिले के एसपी को स्वत्रंत्र रूप से निर्णय का अधिकार मिलता है। मौजूदा व्यवस्था में जिले के एसपी को कलेक्टर के अधीन काम करना पड़ता है। कमिश्नर प्रणाली में ऐसा नहीं रहता। एसपी खुद निर्णय कर सकते हैं। इससे अपराध नियंत्रण में निर्णय की गति तेज होती है। ज्यादातर महानगरों में यही सिस्टम लागू है।
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ये अहम बदलाव नई प्रणाली से-
पुलिस कमिश्नर प्रणाली के लागू होने पर पुलिस को कई अधिकार और मिल जाएंगे। इसमें धरना, प्रदर्शन की अनुमति से लेकर शस्त्र लायसेंस देने के अधिकार मिल जाएंगे। अपराध नियंत्रण के लिए अपराधियों के खिलाफ एनएसए, जिला बदर की कार्रवाई भी पुलिस कमिश्रनरी सिस्टम पुलिस के पास आ जाएगी। साथ ही कानून व्यवस्था से जुड़े अधिकार भी पुलिस के पास आ जाएंगे। धारा 144 लागू करने और लाठीचार्ज करने का अधिकार भी पुलिस के पास आ जाएगा। इन सभी मामलों में कलेक्टर या एसडीएम से मंजूरी की अनिवार्यता खत्म हो जाएगी। अभी इन सभी प्रकरणों में कलेक्टर या एसडीएम पर मंजूरी लेना होती है। इसके अलावा पुलिस गिरफ्तारी और सीधे कोर्ट भेजने में भी त्वरित एक्शन ले सकेगी। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा (8) की उपधारा 1 के तहत राज्य शासन किसी भी क्षेत्र को पुलिस कमिश्नर प्रणाली प्रयोजन के लिए मेट्रोपोलिटिन क्षेत्र घोषित कर सकता है। पुलिस एक्ट 1861 की धारा (2) के तहत ऐसे मेट्रोपोलिटिन क्षेत्र के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को पुलिस कमिश्नर घोषित किया जा सकता है। ये अधिकारी आइजी स्तर के होंगे। पुलिस कमिश्नर को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा (20) की उपधारा (5) के तहत कार्यपालिक मजिस्ट्रेट के अधिकार दिए जा सकते हैं।
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अर्जुन सिंह सरकार से लगातार प्रयास: यूं जानिए, कब-कब क्या उठे कदम...
प्रदेश में पुलिस कमिश्नर प्रणाली का जिन्न दशकों से बार-बार बोतल से बाहर निकल आता है। इसके बाद आईएएस-आईपीएस की रस्साकशी में मामला उलझ जाता। प्रदेश में सबसे पहले कांग्रेस की अर्जुन सिंह सरकार के समय इस पर विचार शुरू हुआ था। तब, एक समिति बनाकर इसका प्रारूप तैयार करना शुरू किया गया था। इसके बाद दिग्विजय सरकार के सेकंड कार्यकाल में भी इस पर प्रयास शुरू हुए। फिर सीएम शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में दो बार इस पर गंभीर स्तर पर प्रयास हुए। वर्ष-2012 में सीएम शिवराज ने इसका ऐलान कर दिया था। बाद में मामला उलझ गया। इसके बाद 2017-18 में इस मामले ने फिर रफ्तार पकड़ ली। बकायदा इसका प्रस्ताव बनाकर पुलिस महकमे ने सीएम को सौंप दिया। सीएम इस पर राजी थी, लेकिन बाद में दूसरे राज्यों का अध्ययन करने के नाम पर फिर मामला अटक गया। इसके बाद अगस्त 2020 में भी सीएम शिवराज ने इसे लागू करने की बात कही थी, लेकिन कोरोना काल के बीच मामला आगे नहीं बढा।
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अभी आगे क्या : ये उठाने होंगे कदम-
1. सरकार की मंशा इसे जल्द लागू करने की है। सरकार के अफसरों के स्तर पर इसे अप्रैल 2022 से लागू होने की संभावना जताई गई है।
2. पूरी तरह इसे लागू करने के लिए विधेयक लाना होगा। इसमें विधेयक को पहले कैबिनेट और फिर विधानसभा से मंजूर करके लागू करना होगा।
3. इसे यदि जल्द लागू करना है तो विधेयक की बजाए अध्यादेश के रूप में पहले कैबिनेट से मंजूर कराकर लागू कर सकते हैं। बाद में अध्यादेश भी विधानसभा से मंजूर होगा। यह अधिकतम 6 महीने के लिए रहता है।
4. अध्यादेश लाने पर छह महीने के भीतर विधेयक लाकर कैबिनेट और फिर विधानसभा से मंजूर करके लागू करना होगा। विधेयक मंजूर करने में सबसे ज्यादा समय लगता है।
5. सरकार को यदि इसे और जल्दी लागू करना हो तो अध्यादेश या विधेयक के विकल्प को छोडकर नोटिफिकेशन के जरिए भी लागू कर सकती है। अध्यादेश या विधेयक बाद में लाए जाएं।
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सेटअप व्यवस्था ऐसी संभावित-
पिछले प्रस्ताव के मुताबिक पुलिस कमिश्नर सिस्टम के पिरामिड में डीजी, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक, एडीजी स्तर के अधिकारी को पुलिस कमिश्नर बनाया जा सकता है। उनके नीचे एडीजी या आईजी स्तर के दो ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर रहते हैं। यह पिरामिड में एडिशनल पुलिस कमिश्नर होंगे, जिसकी जिम्मेदारी आईजी या डीआईजी स्तर अफसरों को मिलेगी। इसी तरह डिप्टी पुलिस कमिश्नर डीआईजी या एसपी स्तर के होंगे। जूनियर आईपीएस या वरिष्ठ एसपीएस अधिकारियों को असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर बनाया जा सकेगा।
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आईएएस-आईपीएस में टकराव क्यों?
आईएएस व आईपीएस में इस विषय पर अधिकारों को लेकर टकराव की नौबत आती रही है। अभी कलेक्टर के रूप में आईएएस जिले का सबसे बड़ा अधिकारी होता है। आईएएस के पास ही लाठीचार्ज से लेकर शस्त्र लायसेंस, गिरफ्तारी के बाद जेल, कोर्ट सहित अन्य अधिकार होते हैं, लेकिन पुलिस कमिश्नर प्रणाली में यह सारे अधिकार एसपी के रूप में आईपीएस के पास आ जाते हैं। आईपीएस ज्यादा पॉवरफुल हो जाते हैं। अपराध नियंत्रण के नाम पर आईपीएस के अधिकार असीमित हो जाते हैं। इस कारण आईएएस व आईपीएस लॉबी इस मुद्दे पर मतभेद रखती है।
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प्रणाली के समर्थन में ये तर्क-
भोपाल-इंदौर में सबसे बड़े व विकसित शहर हैं। यहां प्रदेश को पंद्रह से बीस फीसदी अपराध है। वीआईपी मूवमेंट भी इन्हीं शहरों में ज्यादा है। इस कारण अपराध नियंत्रण के लिए त्वरित निर्णय व क्रियान्वयन जरूरी है। इस कारण यह प्रणाली चाहिए।
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प्रणाली के विपक्ष में यह तर्क-
पुलिस को ज्यादा अधिकार मिल जाने से डंडाराज हो जाता है। लाठीचार्ज जैसी घटनाएं सामान्य धरना-प्रदर्शन में बढ़ सकती। गिरफ्तारी, जेल और अन्य कार्रवाई में बर्बरता व तानाशाही आ सकती है। आम पुलिस के बेलगाम होने का खतरा, लोगों को इससे परेशानी बढ सकती है
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Published on:
21 Nov 2021 08:23 pm
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