
भोपाल। प्रदेश के 700 से अधिक सरकारी डॉक्टर प्राइवेट प्रैक्टिस कर कमाई तो कर रहे हैं, पर महज एक हजार रुपए की सालाना फीस रोगी कल्याण समिति में जमा कराने से परहेज कर रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग ने इनके रिकार्ड की जांच कर वसूली की तैयारी कर रही है। प्रदेश के कई डॉक्टर ऐसे हैं जिन पर यह फीस 18 साल से अधिक समय से बकाया है। सख्ती से वसूली के लिए मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारियों (सीएमएचओ) को निर्देश दिए हैं। 1999 में तत्कालीन दिग्विजय सिंह सरकार में प्राइवेट प्रैक्टिस पर लगाए गए प्रतिबंध को इस शर्त के साथ वापस लिया था कि जिला मुख्यालय के अस्पतालों व सिविल अस्पतालों में पदस्थ डॉक्टरों को फीस देनी होगी।
मेडिकल अफसरों के लिए 500 और स्पेशलिस्टों को 1000 रुपए सालाना रोगी कल्याण समिति के खाते में जमा कराना था, लेकिन यह रकम भी डॉक्टरों ने जमा नहीं कराई। सामुदायिक व प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में पदस्थ रहे डॉक्टर इससे मुक्त रखे गए थे।
रिटायर हो गए पर फीस नहीं भरी
विभाग ने स्वीकार किया है कि कई डॉक्टर ऐसे हैं, जिन्होंने 1999 से अब तक रोगी कल्याण समिति के खाते में फीस नहीं जमा कराई है। इनमें से कुछ तो सेवानिवृत्त भी हो चुके हैं। विभाग उनके साथ भी सख्ती करेगा और जरूरी हुआ तो पेंशन से राशि कटौती के लिए प्रस्ताव लाएगा। जिलों को सभी चिकित्सकों का रिकार्ड तैयार करने के लिए कहा गया है।
इन्हें प्राइवेट प्रैक्टिस की छूट
प्रशासनिक दायित्व व प्रोजेक्ट में काम करने वाले डॉक्टरों को छोड़कर शेष सभी के लिए प्राइवेट प्रैक्टिस में छूट है। इसलिए उन्हें नान पै्रक्टिस अलाउंस (एनपीए) की पात्रता से बाहर कर दिया गया है। विभाग द्वारा
किसी तरह का पंजीयन और पूर्व अनुमति की
शर्त नहीं रखे जाने से मॉनिटरिंग नहीं हो पाती है। जबकि प्रशासनिक कामकाज में लगे डॉक्टरों को छठे वेतनमान के अनुसार मूल वेतन का 25 फीसदी एनपीए दिया जाता है।
लंबे समय से डॉक्टरों द्वारा प्राइवेट प्रैक्टिस फीस नहीं भरे जाने के मामले सामने आए हैं। सभी को नोटिस देकर राशि जमा कराने के निर्देश दिए गए हैं। जरूरत पड़ी तो सख्ती से वसूली की कार्रवाई की जाएगी।
- डॉ. केके ठस्सू, डायरेक्टर हॉस्पिटल एडमिनिस्टे्रशन
Published on:
14 Feb 2018 10:00 am
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