
shiv pooja
भोपाल। भगवान भोलेनाथ की साधना के लिए भक्त सोमवार को विशेष पूजा और व्रत करते हैं लेकिन क्या आप जानते हैं हर हफ्ते यह विशेष पूजा करने की जगह यदि केवल प्रदोष व्रत के नियम का पालन किया जाए तो जीवन की रह बड़ी से बड़ी कठिनाई आसान हो सकती है। यह व्रत हिंदू धर्म के सबसे शुभ व महत्वपूर्ण व्रतों में से एक है। हिंदू चंद्र कैलेंडर के अनुसार प्रदोष व्रत चंद्र मास के 13 वें दिन (त्रयोदशी) पर रखा जाता है। माना जाता है कि प्रदोष के दिन भगवान शिव की पूजा करने से व्यक्ति के पाप धूल जाते हैं और उसे मोक्ष प्राप्त होता है।
जानिए प्रदोष व्रत का महत्व
शास्त्रों में बताया गया है कि प्रदोष व्रत को रखने से दो गायों को दान देने के समान पुन्य फल प्राप्त होता है। प्रदोष व्रत का पौराणिक महत्व भी है। ऐसा माना जाता है कि 'एक दिन जब चारों और अधर्म की स्थिति होगी, अन्याय और अनाचार का एकाधिकार होगा, मनुष्य में स्वार्थ भाव अधिक होगी तब जो व्यक्ति त्रयोदशी का व्रत रख, शिव आराधना करेगा, उस पर शिव कृपा होगी और वही मोक्ष प्राप्त करेगा।
प्रदोष व्रत करने के फल
- रविवार को पडऩे वाले प्रदोष व्रत से आयु वृद्धि तथा अच्छा स्वास्थ्य लाभ प्राप्त किया जा सकता है।
- सोमवार के दिन त्रयोदशी पडऩे पर किया जाने वाला व्रत आरोग्य प्रदान करता है और इंसान की सभी इच्छाओं की पूर्ति होती है।
- मंगलवार के दिन त्रयोदशी का प्रदोष व्रत हो तो उस दिन के व्रत को करने से रोगों से मुक्ति व स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है।
- बुधवार के दिन प्रदोष व्रत हो तो, उपासक की सभी कामनाओं की पूर्ति होती है।
- गुरुवार के दिन प्रदोष व्रत पड़े तो इस दिन के व्रत के फल से शत्रुओं का विनाश होता है।
- शुक्रवार के दिन होने वाला प्रदोष व्रत सौभाग्य और दाम्पत्य जीवन की सुख-शान्ति के लिए किया जाता है।
- संतान प्राप्ति की कामना हो तो शनिवार के दिन पडऩे वाला प्रदोष व्रत करना चाहिए।
अपने उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए जब प्रदोष व्रत किए जाते हैं तो व्रत से मिलने वाले फलों में वृद्धि होती है।
ऐसे करें प्रदोष व्रत
प्रदोष व्रत करने के लिए त्रयोदशी के दिन सूर्य उदय से पहले उठकर नित्यकर्मों से निवृत होकर, भगवान भोले नाथ का स्मरण करके व्रत करने संकल्प लेना चाहिए। पूरे दिन उपावस रखने के बाद सूर्यास्त से एक घंटा पहले, स्नान आदि कर श्वेत वस्त्र धारण किए जाते है। पूजन स्थल को गंगाजल या स्वच्छ जल से शुद्ध करने के बाद, गाय के गोबर से लीपकर, मंडप तैयार किया जाता है। पूजन की तैयारियां करके उतर-पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठे और भगवान शंकर का पूजन करना चाहिए।
प्रदोष व्रत का उद्यापन
इस व्रत को ग्यारह या फिर 26 त्रयोदशियों तक रखने के बाद व्रत का उद्यापन करना चाहिए। उद्यापन से एक दिन पहले गणेश पूजन किया जाता है। पूर्व रात्रि में कीर्तन करते हुए जागरण किया जाता है। अगले दिन भगवान के लिए मंडप बनाकर 'ऊँ उमा सहित शिवाय नम' मंत्र का एक माला यानी 108 बार जाप करते हुए हवन किया जाता है। हवन में आहूति के लिए खीर का प्रयोग किया जाता है। हवन समाप्त होने के बाद भगवान भोलेनाथ की आरती की जाती है और शान्ति पाठ किया जाता है। अंत में दो ब्रह्माणों को भोजन कराया जाता है और अपने सामथ्र्य अनुसार दान दक्षिणा देकर आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है।
Published on:
30 Aug 2017, 12:05 PM IST
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