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जब ग्वालियर आए थे प्रिंस ऑफ वेल्स तब चमका फूलबाग

शहर के बीचों बीच स्थित फूलबाग पूरे अंचल में सबसे खास है, क्योंकि यह जगह प्रिंस ऑफ वेल्स की मेजबानी कर चुका है।

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Shyamendra Parihar

Nov 04, 2015



ग्वालियर।
शहर के बीचों बीच स्थित फूलबाग पूरे अंचल में सबसे खास है, क्योंकि यह जगह प्रिंस ऑफ वेल्स की मेजबानी कर चुका है। यह पूरे देश के लिए कौमी एकता की मिसाल हैं। ग्वालियर शहर के बीचों-बीच स्थित फूलबाग लोगों को एकता के सूत्र में बंधने का आह्वान करता है।



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जहां मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे के साथ ही थियोसोफिकल सोसाएटी का कार्यालय है। यहां हर रोज घंटा-घडिय़ाल के साथ ही नमाज की अजान भी कानों में गूंजती हैं। इनका निर्माण ग्वालियर के शासक माधवराव सिंधिया प्रथम ने अपने शासनकाल में कराया था। इसके शुभारंभ के लिए खुद प्रिंस ऑफ वेल्स आए थे। उन्होंने ही इसका शुभारंभ किया था।

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1922 में पूरा हुआ था निर्माण
पुरातत्वविद् रमाकांत चतुर्वेदी बताते हैं कि धार्मिक एकता का संदेश देने के लिए फूलबाग पर मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे के साथ ही थियोसोफिकल सोसाइटी का निर्माण कराया गया था। इन सभी का निर्माण साल 1922 में पूरा हुआ था।

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इसमें एक साथ भगवान कृष्ण का गोपाल मंदिर, मोती मस्जिद, गुरुद्वारा और थियोसोफिकल सोसाएटी का हॉल बनाया गया। कई टूरिस्ट गाइड्स का कहना है कि विदेशी सैलानी एक ही जगह पर एेसी बनावट देखकर चौंक जाते हैं। इस तरह की मिसालें पूरे विश्व में बहुत ही कम है।

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पारंपरिक शैलियों में निर्माण
चतुर्वेदी बताते हैं कि सभी धार्मिक स्थलों का निर्माण पारंपरिक शैलियों में कराया गया है। मंदिर मराठा शैली का प्रतिनिधत्व करता है। वहीं मस्जिद और गुरुद्वारा भी धार्मिक परंपरा के अनुरूप बनवाए गए हैं।


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सबके निर्माण में शहर में पाए जाने वाले सेंड स्टोन का उपयेाग किया गया है। गार्डन के मुख्य द्वार पर सोने का ताला लगाया गया था। मगर बाद में वो कहां गया ये स्पष्ट नहीं हो सका।

बड़ी संख्या में आते हैं सैलानी
ग्वालियर के मोती मस्जिद, गुरुद्वारा और गोपाल मंदिर में स्थानीय लोगों के साथ ही बड़ी संख्या में बाहर के सैलानी भी आते हैं। इन धरोहरों में बेहतरीन नक्काशी पयर्टकों को अपनी ओर आकर्षित करती है।

गोपाल मंदिर में विराजमान श्रीकृष्ण-राधा की प्रतिमा अष्टधातु से निर्मित है, जो काफी बहुमूल्य है। खास बात यह है कि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर मंदिर में करीब 10 करोड़ के हीरे-जेवरात से भगवान को सजाया जाता है, जो पूरे अंचल में आकर्षण का केन्द्र है।

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