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शिकार के कारण कभी मध्यप्रदेश से बाघ खत्म होने की कगार पर थे, आज 700 बाघों का बसेरा

मध्यप्रदेश को टाइगर स्टेट बनाने के पीछे 50 वर्षों की मेहनत है। इस दौरान बाघ से ज्यादा इंसानों के हमले झेलने पड़े। क्योंकि टाइगर रिजर्व बनाने के लिए गांवों का विस्थापन करना जरूरी था। ग्रामीण इसके लिए आसानी से नहीं मानते थे।

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Tiger roar

Tiger in Kailashpur forest

भोपाल। मध्यप्रदेश में प्रोजेक्ट टाइगर के जनक कहे जाने वाले सेवानिवृत्त पीसीसीएफ जेजे दत्ता का कहना है कि जब देश में 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर शुरू हुआ तो देश के 9 टाइगर रिजर्व में से एक कान्हा नेशनल पार्क भी था। दत्ता ने कहा कि उस वक्त ये सोच थी कि इंसान और बाघ साथ रह सकते हैं, लेकिन हकीकत में ऐसा करना संभव नहीं था। इंसान और बाघ के द्वंद्व को हमेशा के लिए नहीं टाला जा सकता था। इससे हमेशा बाघ की जिंदगी पर खतरा मंडराता रहता। ये एक ऐसा नेशनल पार्क था जो इस प्रोजेक्ट के लिए सबसे मुफीद था। उस वक्त तक प्रदेश में सिर्फ शिवपुरी और कान्हा ही नेशनल पार्क थे, जो 1935 में बने थे।

1968 में बांधवगढ़ में एक भी बाघ नहीं था

दत्ता ने कहा कि 1968 में बांधवगढ़ में एक भी बाघ नहीं था। क्योंकि यहां शिकार के लिए सारे बाघों को मार दिया गया। चीफ कंजर्वेटर केएन मिश्र ने तत्काल बांधवगढ़ आने को कहा। वहां सीएम गोविंद नारायण सिंह, रीवा महाराज और महारानी भी थे। हम लोग दो दिन तक जंगल में घूमते रहे, लेकिन एक भी चौपाया दिखाई नहीं दिया। हम लोग निराश हो गए कि यहां टाइगर को कैसे बसा पाएंगे। उस समय वहां ग्रामीण दस हजार मवेशी चराते थे। जब हमने सख्ती करने का निर्णय लिया तो पता चला उत्तर प्रदेश के लोग यहां इन्हें चराने लाए। आठ साल की मेहनत के बाद यहां बाघ लौट पाया। केंद्र के एक अफसर ने जब बाघ को सांभर का शिकार करते देखा तो वे तत्काल प्रोजेक्ट को फंड देने को तैयार हो गए।

अब 49 करोड़ की कमाई
मेरे प्रयासों से ही मप्र और छत्तीसगढ़ में नौ नेशनल पार्क और 22 सेंचूरी बन पाए। आज टाइगर रिजर्व के जरिए अन्य प्रजातियों को भी संरक्षण मिला है। कान्हा के जरिए ही बारहसिंगा को बचाया जा सका। आज टाइगर रिजर्व में करीब 40 प्रतिशत स्टाफ की कमी है, इस कारण शिकार की घटनाएं सामने आती है। इसका दूसरा पहलू भी है कि आज मप्र में बाघों के कारण पर्यटन बढ़ रहा है। अकेले 2021-22 में 49 करोड़ की आय हुई। आज ड्रोन से बाघों की निगरानी हो रही है। उस दौर में प्रदेश में करीब 400 बाघ थे, जिनकी संख्या आज करीब 700 है।

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