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रमजान स्पेशल: मशहूर लेखिका पद्मश्री मेहरून्निसा परवेज ने शेयर की अपनी यादें

रमजान का महीना शुरू होने वाला था, गांव में तैयारियां चल रही थीं।

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Nitesh Tiwari

Jun 16, 2016

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भोपाल. रमजान का महीना शुरू होने वाला था, गांव में तैयारियां चल रही थीं। मैंने अम्मी के सामने इस बार रोजे रखने की ख्वाहिश जाहिर की, लेकिन अम्मी और अब्बू सभी ने मना किया, क्योंकि मैं उस वक्त पांचवीं में पढ़ती थी। छोटी थी और गर्मियों के दिन थे। अम्मी-अब्बू को फिक्र ज्यादा थी, लेकिन मेरी जिद के सामने वालिद रोजा रखने के लिए रजामंद हो गए। पहले रोजे पर दिन भर मेरी निगरानी हुई। खौफ था कि तबीयत बिगड़ सकती है। हालांकि, प्यास ने बेहाल जरूर कर दिया था, बावजूद रोजा पूरा कर लिया और फिर आंगन में बैठकर सबके साथ इफ्तारी की।


गांव से जुड़ी है पहली याद
मशहूर लेखिका पद्मश्री मेहरून्निसा परवेज अपने पहले रोजे की दास्तां बयां करते हुए बताती हैं, कि जब अम्मी-अब्बू से रोजा रखने की इजाजत मिल गई तो मैं भी खुश हो गई। उन दिनों स्कूल की गर्मियों की छुट्टियां चल रही थी, तो हम सभी अपने गांव बेहला बालाघाट में रहा करते थे। रमजान की चर्चा पहले से ही गांव में शुरू हो गई थी। पहले रोजे के लिए सहरी की तैयारी मैंने अपनी अम्मी के साथ की। घर में बड़ा सा आंगन था, जहां सभी लोग पलंग बिछाकर सोया करते थे। इसी आंगन में सेहरी के लिए चादर बिछा दी गई थी। सभी के साथ सेहरी की।

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अब्बू करे थे निगरानी
अम्मी ने रोजे से बावस्ता तमाम हिदायतें भी दीं। मसलन दिनभर कुछ नहीं खाना है, पानी नहीं पीना है। नमाज पढऩा है, शाम को इफ्तार के बाद ही कुछ खा-पी सकोगे। वे बताती हैं कि रोजा तो रख लिया। लेकिन, दिन में भूख-प्यास से बुरा हाल हो गया था, दिन काफी मुश्किल से गुजरा। दिन में सहेलियों के साथ थी, तब भी अब्बू पूरे दिन मेरी निगरानी करते रहे, कि बच्ची को कहीं चक्कर न आ जाए।


गर्मियों के दिन भी बड़े थे, इसलिए इफ्तार भी देर से हुआ। इफ्तार के वक्त आस-पड़ोस के लोग घरों से खाने की चीजें लेकर आए और फिर सभी आंगन में साथ बैठे और रोजा इफ्तार किया। बस रोजे रखने का सिलसिला शुरू हो गया, बचपन के वो दिन आज भी बहुत याद आते हैं।


अम्मी संग करती थी सेहरी
अब्बू का अक्सर तबादला होता रहता था, इसलिए हमें एक-दो साल में एक से दूसरे शहर जाना पड़ता। तब अब्बू की पोस्टिंग बस्तर में थी, मैं काफी छोटी थी। अब्बू रोजे नहीं रखते थे, लेकिन अम्मी रखती थी। अम्मी रात में ही सेहरी के लिए खाने की चीजें पकाकर बिना बताए रख देती थीं, लेकिन मुझे मालूम होता था। रात में जैसे ही अम्मी सेहरी के लिए उठतीं, कुछ वक्त बाद मैं भी उठ जाती थी और अम्मी के साथ सेहरी करती थी।


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