भोपाल. रमजान का महीना शुरू होने वाला था, गांव में तैयारियां चल रही थीं। मैंने अम्मी के सामने इस बार रोजे रखने की ख्वाहिश जाहिर की, लेकिन अम्मी और अब्बू सभी ने मना किया, क्योंकि मैं उस वक्त पांचवीं में पढ़ती थी। छोटी थी और गर्मियों के दिन थे। अम्मी-अब्बू को फिक्र ज्यादा थी, लेकिन मेरी जिद के सामने वालिद रोजा रखने के लिए रजामंद हो गए। पहले रोजे पर दिन भर मेरी निगरानी हुई। खौफ था कि तबीयत बिगड़ सकती है। हालांकि, प्यास ने बेहाल जरूर कर दिया था, बावजूद रोजा पूरा कर लिया और फिर आंगन में बैठकर सबके साथ इफ्तारी की।