27 अप्रैल 2026,

सोमवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

दंड के प्रावधान में अटका पानी के अधिकार का कानून,  सरकारी विभागों ने जताई आपत्ति

- डेड लाइन 15 नवंबर तक नहीं बन पाया ड्राफ्ट- इस महीने अंतिम रुप देने की तैयारी      

3 min read
Google source verification

भोपाल

image

Arun Tiwari

Nov 21, 2019

दंड के प्रावधान में अटका पानी के अधिकार का कानून,  सरकारी विभागों ने जताई आपत्ति

दंड के प्रावधान में अटका पानी के अधिकार का कानून,  सरकारी विभागों ने जताई आपत्ति

भोपाल : सरकार अब तक पानी के अधिकार कानून के मसौदे को अंतिम रुप नहीं दे पाई है। राइट टू वॉटर एक्ट में अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जा रही है। एक्ट का पालन न करने वालों को दंडित करने का प्रावधान किया गया है। इस प्रावधान पर कई विभागों ने आपत्ति जताई है। अब इस पर विचार किया जा रहा है कि दंडित करने का प्रावधान रखा जाए या नहीं। बात इस पर भी अटकी है कि यदि दंड दिया भी जाए तो उसका स्वरुप क्या होना चाहिए। सूत्रों की मानें तो सरकार इस सजा के प्रावधान को हटाने के पक्ष में नहीं है।

ये भी तय नहीं हो पा रहा है कि पानी की इस बड़ी व्यवस्था को सुचारु रुप से चलाने के लिए सरकारी अमले को किस तरह से जवाबदेह बनाया जाए। सरकार पूरे विचार के बाद इस कानून को अंतिम रुप देना चाहती है। इस मसौदे को 15 नवंबर तक तैयार करना था लेकिन अब इसकी समय सीमा बढ़ गई है। माना जा रहा है कि कानून के ड्राफ्ट को इस महीने के अंत तक अंतिम रुप दे दिया जाएगा।

एक्ट के उल्लंघन पर इस तरह का प्रावधान :

- इस कानून का उल्लंघन करने वाले के खिलाफ मुकादमा दायर किया जाएगा। उस पर कार्रवाई की जाएगी।
- पानी के अधिकार की निगरानी करने वाली कमेटी या अधिकारी नियम तोडऩे वाले के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया अपना सकते है।
- सरकार विभागीय कार्रवाई कर सकती है।
- किसी को लगता है कि उसके खिलाफ अनुचित कार्रवाई हुई है तो वो सरकार के सामने ये बिंदु उठा सकता है।
- वॉटर सिक्यूरिटी प्लान के नियमों का उल्लंघन होने पर कोई भी व्यक्ति, समूह, समाज या गैर सरकारी संगठन अदालत में पिटीशन फाइल कर सकता है।
- औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला पानी यदि लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है तो इसके लिए वे जिम्मेदार होंगी, स्टेट वॉटर मैनेजमेंट अथॉरिटी उन पर जुर्माना लगा सकती है।
- अथॉरिटी पानी देने की अनुमति निलंबित या रद्द कर सकती है।

इन विभागों को आपत्ति :

पानी के अधिकार कानून के मसौदे में ये लिखा हुआ है कि अच्छा काम करने वालों को पुरस्कृत किया जाएगा और लापरवाही बरतने वाले अधिकारी-कर्मचारियों को दंडित किया जाएगा। राइट टू वॉटर के संचालन की नोडल एजेंसी पीएचई विभाग है लेकिन इससे अन्य विभाग भी जुड़े हुए हैं। किसी भी प्रकार के दंड के प्रावधान पर पंचायत एवं ग्रामीण विकास, नगरीय प्रशासन और नर्मदा घाटी विभाग ने खास तौर पर आपत्ति जताई।

तर्क दिया गया है कि राइट टू वॉटर का बड़ा काम सरकार करने जा रही है इसलिए इसमें सकारात्मक भाव ही होना चाहिए, किसी भी किस्म की नकारात्मकता से बचना चाहिए। इन विभागों को लगता है कि दंड के प्रावधान से इस काम से जुड़ा सरकारी अमला दबाव में आ जाएगा। उसे हमेशा ये डर रहेगा कि कहीं किसी और की सजा उसके हिस्से में तो नहीं आ जाएगी।

विशेषज्ञों से मांगी राय :

सरकार ने इस कानून के मसौदे को अंतिम रुप देने के लिए सरकार ने हाईपॉवर कमेटी बनाई है। इस कमेटी में जल विशेषज्ञों को भी शािमल किया गया है। खासतौर पर जल पुरुष राजेंद्र सिंह और योजना आयोग के पूर्व सदस्य मिहिर शाह भी शामिल हैं। सरकार ने इनसे कानून के मसौदे पर राय मांगी है। इनकी राय और सुझाव के बाद इस ड्राफ्ट को अंतिम रुप दिया जाएगा। इनसे दंड के प्रावधान के बारे में भी पूछा गया है।

- हम पानी के अधिकार कानून पर बहुत गंभीरता से काम कर रहे हैं, इसमें कोताही बर्दाश्त नहीं होगी। जहां तक दंड के प्रावधान पर आपत्ति की बात है तो यदि दंड नहीं होगा तो इस बड़ी योजना का बेहतर क्रियान्वयन कैसे सुनिश्चित होगा। दंड किस रुप में हो इस पर विचार किया जा रहा है लेकिन इस कानून के क्रियान्वयन में लगने वाले पूरे सिस्टम को अनुशासित रखने के लिए कुछ तो तय करना पड़ेगा। इस महीने मसौदे को अंतिम रुप दे दिया जाएगा।

- सुखदेव पांसे पीएचई मंत्री -