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विदेश मंत्री का वादा भी रहा खोखला, नहीं बदली बेतवा की तकदीर – देखें वीडियो

ईसा फाउंडेशन के सद्गुरु जग्गी बेतवा तट पर रविवार को नदी संरक्षण अभियान में शामिल होने विदिशा आ रहे हैं।

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nadi abhiyan

विदिशा। कलयुग की गंगा बेतवा अब अपने नाम पर भी चिंतन कर रही होगी कि क्या मैं पद्मपुराण में बखानी वही बेतवा हूं। वर्षों बीत गए, लेकिन अब तो बेतवा का जल आचमन के काबिल भी नहीं रहा। विदिशा-रायसेन जिलों में कई बड़े उद्योगों का अपशिष्ट और विदिशा में ही चोर घाट का नाला कई दशकों से बेतवा की बूंद-बूंद को अशुद्ध और जहर बना रहा है।

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने तो बेतवा के संरक्षण और संवर्धन के लिए वृहद परियोजना बनाने का भरोसा भी इस शहर को दिलाया था, लेकिन अरसा बीत गया और बेतवा के संवारने में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा। रविवार को नदी संरक्षण अभियान को लेकर ईसा फाउंडेशन के सद्गुरु बेतवा के रंगई घाट पर आ रहे है। यकीनन जागरुकता जरूरी है, लेकिन शासन -प्रशासन द्वारा अपना दायित्व निभाए बिना, सिर्फ जागरूकता से नदी नहीं बच सकती।

जब तक कारखानों का जहर, शहर के मलमूत्र वाले नालों की गंदगी नदी में मिलना शुरू नहीं होगी, तब तक नदी संरक्षण में जागरुकता बेमानी बनकर ही रह जाएगी।
गंगा के लिए परियोजना, नर्मदा के लिए परियोजना, अरबों खर्च, लेकिन जिस नदी से विदेश मंत्री का संसदीय क्षेत्र और मुख्यमंत्री का घर जैसा विदिशा पलता है, उसकी परवाह किसी को नहीं। चोर घाट नाले को बेतवा में मिलने से रोकने के लिए पं. मदनलाल शर्मा बेतवा बाबा, पं. गोविन्द प्रसाद शास्त्री जैसे लोग आखरी दम तक लड़ते रहे। लेकिन इस नाले को रोकने की हिम्मत न कोई जनप्रतिनिधि करा सका और न कोई अधिकारी। आज भी शहर की तमाम गंदगी को जहरीले झाग के रूप में समेट कर यह नाला खुलेआम बेतवा में मिल रहा है।

बड़े प्रोजेक्ट तो दूर की बात है, छोटे-छोटे से कामों के लिए भी बेतवा वर्षोँ से तरस रही है। एक नाले को ही प्रशासन बंद नहीं करा पाया। दूसरे मुक्तिधाम के पास लम्बे समय से सीवरलाइन फूटी पड़ी है। चरण तीर्थ के पास मुर्दो की राख और मुंडन संस्कार के बालों का ढेर लग रहा है। लेकिन इनका प्रबंध करने की कोशिश भी प्रशासन ने नहीं की।

नदी संरक्षण योजना तथा अन्य नामों से पिछले करीब 3 वर्षों में करोड़ों रूपए खर्च कर दिया गया। लेकिन बेतवा की शुद्धता के लिए कोई काम कारगर नहीं हुआ। बेतवा के प्रति लोगों की आस्था और जागरुकता में कमी कतई नहीं। जरूरत है तो शासन-प्रशासन में बैठे यहां के जिम्मेदार लोगों की, जो अपने दायित्वों से मुंह मोड़कर सिर्फ मंचों से ठकुरसुहाती करते रहे हैं।







किसी ने भी बेतवा के लिए कोई सार्थक प्रयास नहीं किया। गंगा के लिए परियोजना, नर्मदा के लिए परियोजना, अरबों खर्च, लेकिन जिस नदी से विदेश मंत्री का संसदीय क्षेत्र और मुख्यमंत्री का घर जैसा विदिशा पलता है, उसकी परवाह किसी को नहीं।