
काबुल में बने वाद्ययंत्र रबाब पर किया जाता है रूफ नृत्य, दुल्हन को रिझाने महिला की वेशभूषा में दूल्हा करता है बचनगमा नृत्य
भोपाल। जनजातीय संग्रहालय में गायन, वादन और नृत्य गतिविधियों के प्रदर्शन की साप्ताहिक शृंखला उत्तराधिकार में रविवार को निर्गुण गायन और कश्मीर के लोकनृत्य की प्रस्तुतियां हुई। कश्मीर के 15 कलाकारों के दल ने अपनी प्रस्तुति से जम्मू और कश्मीर की समृद्ध लोक परंपरा को मंच पर उतारा। कार्यक्रम की शुरुआत संत सिंगाजी के पद निर्गुण गायन सुमरां हो मनमाय... गणेश वंदना से हुई। कलाकारों ने निमाड़ तथा भुवाड़ा की लोक शैली में गायन के साथ शास्त्रीय संगीत का मिश्रण प्रस्तुत किया। इसके बाद मुख्य पद्य देवता देख ले रे...., निरगुण ब्रह्म है न्यारा... भजन पेश किए। गायन में सुमित शर्मा के साथ सह—गायन में निशा शर्मा, वैष्णवी लाहौरे, अमित राजपूत, सुरेश काकडे, तबले पर ज्ञानी सालगे और ढोलक पर अजय कुशवाह ने संगत दी।
डोगरी नृत्य से पेश की जम्मू की संस्कृति
एक घंटे की प्रस्तुति के दौरान कश्मीर के दल ने जम्मू और कश्मीर की लोक कलाओं से दर्शकों को रू-ब-रू कराया। प्रस्तुति की शुरुआत उन्होंने जम्मू के डोगरा समुदाय के लोकनृत्य डोगरी से की। ये नृत्य लोहड़ी, होली और शादी के समय किया जाता है। समुदाय के महिला-पुरुष मंदिर परिसर में एकत्रित होकर ईश्वर की आरधना कर इस नृत्य की शुरुआत करते हैं। इसके बाद कलाकारों ने बचनगमा नृत्य की प्रस्तुति दी। ये कश्मीर का करीब 500 साल पुराना लोकनृत्य है। कलाकार रूबीना अख्तर ने बताया कि इस नृत्य को केवल पुरुष कलाकारों को ही करने की इजाजत है, क्योंकि कश्मीर में शादी से एक रात पहले संगीत का आयोजन किया जाता है। इसमें पुरुष अपने होने वाली पत्नी के लिए नृत्य के माध्यम से अपनी प्रेम भावनाओं का इजहार करता है। होने वाला दूल्हा पारंपरिक वेशभूषा में देर रात तक नृत्य करता है। संगीत सभा में बैठी महिलाएं उसके साथ गाती और नृत्य करती है। प्रस्तुति के दौरान कलाकार ने ह गुलो त्वहे मसा वुचवुन यार म्योन(ये लड़की आवाज देती है गुलाबों को, आपने मेरे यार को कहीं देखा है क्या)... गीत पर नृत्य पेश किया। इस नृत्य में कलाकार महिला की ड्रेस में विभिन्न करतब दिखाए।
ईद पर किया जाता है रूफ नृत्य
अगली कड़ी में कलाकारों ने रूफ नृत्य पेश किया। मुख्य रूप में रहने वाली मुस्लिम समाज की महिलाएं ईद के मौके पर ये नृत्य करती है। इस नृत्य को घर में बने दालान में किया जाता है। महिलाएं रंगीन वेशभूषा में आकर दो पंक्तियों में एक-दूसरे के सामने खड़ी होकर करती है। इसमें मुख्य रूप से पैरों का उपयोग शामिल होता है जिसे स्थानीय भाषा में चकरी कहा जाता है। कलाकारों ने ईद आए रस-रस, ईद का वसवई(आहिस्ता-आहिस्ता ईद आ गई है, हम ईदगाह चलते हैं)... पर नृत्य पेश किया। इस नृत्य में हारमोनियम, कश्मीरी रबाब, सारंगी, मटका, तुम्बकनारी(ढोलक) पर संगीत दिया गया। रबाब काबुल में बना वाद्ययंत्र है। अब इसे कश्मीर के कलाकार भी तैयार करते हैं। ये कश्मीर के मुख्य वाद्ययंत्रों में से एक है।
Published on:
09 Feb 2020 10:11 pm
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