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जिन्होंने की भीमबेटका गुफाओं की खोज, उनके सम्मान में RSS करेगी हेरिटेज वॉक का आयोजन, जानें कौन हैं वो

विष्णु श्रीधर वाकणकर थे संस्कार भारती के संस्थापक महामंत्री

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भोपाल/ भारतीय परिप्रेक्ष्य में औपनिवेशिक इतिहास को फिर से अपनी बोली में लिखने, संघ परिवार ने अब पुरात्वविद विष्णु श्रीधर वाकणकर की ओर रुख किया है। वाकणकर ने ही मध्यप्रदेश के रायसेन में स्थित भीमबेटका गुफा की खोज की थी। भीमबेटका को दुनिया के इस हिस्से में मानव बस्तियों के शुरुआती सबूत के रूप में भी जाना जाता है। इसके साथ ही विष्णु श्रीधर वाकणकर को सरस्वती नदी की खोज के लिए भी जाना जाता है। वेदों में तो इस नदी का जिक्र है, लेकिन ज्यादातर इतिहासकार इसे मिथक मानते रहे हैं।

ऐसे में आरएसएस की सांस्कृतिक शाखा संस्कार भारती ने विष्णु श्रीधर वाकणकर के सम्मान में 100 हेरिटेज वॉक का प्लान किया है। खबरों के अनुसार ललित कला अकादमी जैसे सरकार द्वारा संचालित सांस्कृतिक संस्थाएं भी उनके सम्मान में पूरे साल कार्यक्रम आयोजित करेगी। सूत्रों के अनुसार इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में भी उनके सम्मान में एक विशेष गैलरी बनाई जाएगी।

भीमबेटका की खोज
पुरातत्वविद विष्णु श्रीधर वाकणकर ने भीमबेटका के दस किलोमीटर की एरिया में करीब 700-विषम रॉक शेल्टर खोजे थे। इन गुफाओं में पेंटिंग भी हैं, जो वैज्ञानिकों के अनुसार करीब 30,000 साल पहले पुरापाषाण युग में बनाई गई थईं। यूनेस्को ने 1970 में भीमबेटका को वर्ल्ड हेरिटेज घोषित किया था। चट्टानों पर बनीं कलाकृतियां इस ओर इशारा करती हैं कि यह इंसानों ने ही बनाया है। इससे यह साबित होता है कि यहां इंसान रहते थे।


संस्कार भारती के राष्ट्रीय महासचिव अमीरचंद कहते हैं कि विष्णु श्रीधर वाकणकर द्वारा खोज की भीमबेटका गुफा से यह पता चलता है कि मानव सभ्यता कैसे विकसित हुई। उन्होंने कहा कि हमारे पुराणों में इंसानों के अवतार की अलग-अलग कहानियां हैं। लेकिन भीमबेटका में जो चित्र बने हैं, उनमें सूअर, हाथी, हिरण, मवेशी और सांप हैं। ऐसे में भीमबेटका की खोज हमारी कहानियों और पूजा के तरीकों को मान्य करती है।

विष्णु श्रीधर वाकणकर को सम्मानित करने का फैसले को इतिहासकारों ने भी स्वागत किया है लेकिन कुछ उन्हें आरएसएस के साथ जुड़े होने का इशारा किया। विष्णु श्रीधर वाकणकर संस्कार भारती के संस्थापक महामंत्री थे।


इतिहासकारों की राय
प्रतिष्ठित इतिहासकार नयनजोत लाहिरी कहती हैं कि पुरातत्व और रॉक कला के अध्ययन में वाकणकर का योगदान बहुत अधिक है, उनके रानीतिक संबंध की वजह से उनकी उपलब्धि को कम नहीं कर सकते हैं। वह एक ऐसे पुरातनपंथी पुरातत्वविद थे जिन्होंने रेल और सड़क मार्ग से ट्रैवेल करते समय कई साइटों की खोज की थी। 1974 में जब साइकिल से नरवर जा रहे थे तो उन्होंने आगर में एक प्रागैतिहासिक स्थल को स्पॉट किया।

नयनजोत लाहिरी आगे बताती हैं कि एमएन देशपांडे जैसे पूर्व एएसआई निदेशकों ने यह सुनिश्चित किया कि वाकणकर को विद्वता और प्रतिबद्धता की वजह से भीमबेटका के शोध से जोड़ा रखा गया। जनवरी 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।

सरस्वती नदी की खोज शुरू की
हरियाणा के कुरुक्षेत्र में 1983 में आरएसएस के मोरोपंत पिंगले के सहयोग से विष्णु श्रीधर वाकणकर ने 18 सदस्यीय लोगों की टीम के साथ सरस्वती शोष अभियान शुरू किया। उन्होंने इसके लिए हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात की यात्रा की और निष्कर्ष निकाला कि सरस्वती नदी थी और वह किसी अऩ्य नदी की तुलना में बहुत बड़ी थी। इसके बाद उन्होंने सुझाव दिया कि सिंधु घाटी सभ्यता का नाम बदलकर सारा स्वात सभ्यता कर दिया जाए।

संघ से जुड़े लोगों का मानना है कि विष्णु श्रीधर वाकणकर का ही निष्कर्ष था कि 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को सरस्वती विरासत परियोजना को पुनर्जीवित करने के लिए प्रेरित किया। लेकिन 2004 में कांग्रेस की सरकार ने इसे फिर से स्थगित कर दिया। मगर मोदी सरकार ने इसे फिर से पुनर्जीवित किया है। वहीं 2015 में फिर से हरियाणा सरस्वती हेरिटेज डेवलपमेंट बोर्ड का गठन किया गया है।

हालांकि कुछ इतिहासकार वाणकर पर आरोप लगाते रहे कि यह प्रसिद्धि पाने का तरीका है क्योंकि सरस्वती नदी को लेकर पुरातात्विक साक्ष्य में कभी पुष्टि नहीं हुई है। मगर ऋगवेद जैसे शास्त्ररों में सरस्वती नदी का जिक्र है।

कौन हैं विष्णु श्रीधर वाकणकर
पुरातत्वविद डॉ विष्णु श्रीधर वाकणकर का जन्म मध्यप्रदेश के नीमच जिले में 4 मई 1919 को हुआ। 3 अप्रैल 1988 को उनका निधन हो गया। उन्होंने अपना समस्त जीवन भारत की सांस्कृतिक धरोहरों को सहेजने में अर्पित किया। विष्णु श्रीधर वाकणकर ने अपने शोध से भारत की समृद्ध संस्कृति और सभ्यता से सारे विश्व को अवगत कराया।