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धूल-कीचड़ से धुलेंडी, रंग से खेली जाती थी पंचमी, छह दशक से निकल रहा चल समारोह

रंगपंचमी पर आज निकलेगा चल समारोह

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धूल-कीचड़ से धुलेंडी, रंग से खेली जाती थी पंचमी, छह दशक से निकल रहा चल समारोह

धूल-कीचड़ से धुलेंडी, रंग से खेली जाती थी पंचमी, छह दशक से निकल रहा चल समारोह

भोपाल. रंगपंचमी का चल समारोह शनिवार को 11 बजे से शुरू होगा। वर्तमान में भले ही होली और रंगपंचमी पर रंग और गुलाल उडऩे लगे हो, लेकिन पहले से ऐसा नहीं था। दशकों पहले सिर्फ रंगपंचमी पर ही रंग खेला जाता था, जबकि होली धूल-मिट्टी और कीचड़ से खेलने की पंरपरा थी। चल समारोह का इतिहास भी छह दशक से अधिक पुराना है। पत्रिका ने शहर के बुजुर्गों से रंगपंचमी और चल समारोह का इतिहास जानने की कोशिश की।
पूर्व राष्ट्रपति के छोटे भाई ईश दयाल शर्मा व मुस्लिम त्योहार समिति के अध्यक्ष डॉ,औसाफ शाहमीरी खुर्रम बताते है कि शहर की जामा मस्जिद चौक के चारों और ही होली पर्व और चल समारोह का माहौल रहता है। जुमे व जुमेराती को दोपहर दो बजे जामा मस्जिद में नवाब में आने वाले लोगों पर रंग न डले इसे लेकर हमेशा तनाव रहता है। इसे लेकर पहले कई बार झगड़े की स्थिति बनी, लेकिन दोनों पक्ष के जागरुक नागरिकों ने शासन प्रशासन से पहले आगे आकर गंगा-जमुनी तहजीब की मिशाल हमेशा से ही पेश की है। शांति समिति में आयोजन को लेकर शासन सभी समुदाय से व्यवस्था को लेकर राय लेता रहा है।
विवाद टालने धुलेंडी पर शुरू हुई रंगों से होली
समाजसेवी पं. ओम मेहता बताते है कि उनके पिता हिंद महासभा के शहर प्रमुख पं. उद्धवदास मेहता, पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा के पिता पं.खुशीलाल वैध, शहर के पहले विधायक बाबूलाल भारती सहित अन्य लोगों ने धूल-कीचड़ से होली खेलने पर विवाद होने की स्थिति में धुलेंडी (होली) रंगों से खेलने के लिए लोगों को जागरूक किया।
1929 से शुरू हुआ होलिका दहन
शहर में होली दहन का सार्वजनिक आयोजन 1929-30 में चौक के गुलिया दाई मोहल्ले से शुरू हुआ था। दूसरे ही साल चौक में दो स्थानों पर होलिका दहन होने लगा। मुस्लिम रियासत में नवाब भोपाल ने सामाजिक सौहार्द के रूप में शुरू किया था। भोपाल का देश में विलिनीकरण के बाद इसे सी ग्रेड स्टेट का दर्जा भी मिला। मध्यप्रदेश राज्य बनने के दौरान भोपाल तहसील और सीहोर जिला था।
दूसरे दिन भी मनती थी सीहोर में होली
तब सीहोर भी नबाव रियासत का हिस्सा था। नवाब हमीदुल्ला खान शहर में होली खेलते तो होली के दूसरे दिन रंग खेलने सीहोर जाते थे। इस पर पंरपरा बन गई और आज भी सीहोर में होली दो दिन की होती है।