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बलराज साहनी ने फिल्म के लिए सड़कों पर रिक्शा खींचा, ऐसा अभिनय किया कि पैरों में फफोले तक पड़ गए

भारत भवन के 37वें वर्षगांठ समारोह के तहत फिल्म 'दो बीघा जमीन' का प्रदर्शन

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भोपाल

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Vikas Verma

Feb 19, 2019

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Bharat Bhavan

भोपाल। वर्ष 1953 में बनी एक फिल्म जो बॉक्स ऑफिस पर तो एवरेज रही लेकिन उस फिल्म ने बिमल रॉय को अमर कर दिया। फिल्म का नाम है दो बीघा जमीन... भारत भवन में चल रहे 37वें वर्षगांठ समारोह के तहत सोमवार को इस फिल्म का प्रदर्शन किया गया। फिल्म में मुख्य भूमिका में बलराज साहनी, निरूपा रॉय, मीना कुमारी हैं। इस फिल्म के गीत शैलेन्द्र ने लिखे, म्यूजिक सलिल चौधरी का रहा। गीत लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी और मन्ना डे ने गाए। फिल्म के 'आ जा री आ निंदिया तू आ... अजब तोरी दुनिया हो मेरे राजा... धरती कहे पुकार के... जैसे गाने आज भी लोगों की जुबां पर हैं। वर्ष 1954 में पहली बार फिल्मफेयर पुरस्कार स्थापित किए गए और इस फिल्म को दो पुरस्कार मिले। बिमल रॉय को इस फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का भी पुरस्कार मिला। इसके अलावा सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए प्रथम राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से भी इस फिल्म को सम्मानित किया गया।

रबीन्द्रनाथ टैगोर की कविता से लिया फिल्म का टाइटल

फिल्म में शंभू महतो की भूमिका में बलराज साहनी ने ऐसा अभिनय किया है आप सोच भी नहीं सकते। वे असली शूटिंग के दौरान सड़कों पर रिक्शा खींच कर दौड़े, पैरों में फफोले हो गए लेकिन एक्टिंग ऐसी की आप फिल्म देखकर Óयादा बेहतर समझ सकते हैं। दो बीघा जमीन की कहानी 40 के दशक में सलिल चौधरी ने लिखी थी, तब नाम था रिक्शावाला। कहा जाता है कि फिल्म का टाइटल रबीन्द्रनाथ टैगोर की कविता दुई बीघा जोमी से लिया गया। वैसे तो सलिल संगीतकार थे लेकिन बिमल रॉय ने उनकी कहानी पर दो बीघा जमीन और परख जैसी फिल्में बनाईं। सिनेमा पंडित की मानें तो हजार साल बाद भी अगर भारत की 100 सर्वश्रेष्ठ फिल्मों की सूची बनी तो दो बीघा जमीन फिल्म उसमें जरूर होगी।

जमींदार हड़प लेता है किसान की दो बीघा जमीन

फिल्म की कहानी कुछ ऐसी है कि बेहद विनम्र, सीधा और अनपढ़ किसान शंभू महतो (बलराज साहनी), अपने बूढ़े पिता गंगू, पत्नी पारो (निरुपा रॉय), बेटे कन्हैया और खेती की दो बीघा जमीन के साथ गांव में रहता है। गांव में अकाल पड़ता है लेकिन ये परिवार गुजारा करता है। बुरा वक्त कटता है, कुछ अरसे बाद बरसात होती है और पूरे गांव के किसान खुशी में नाचते-गाते हैं। गांव में एक पूंजीवादी सोच वाल जमींदार होता है ठाकुर हरनाम सिंह (मुराद)। जो शहर के एक कारोबारी के साथ मिलकर गांव में मिल लगाना चाहता है लेकिन उसके मुनाफे की राह में शंभू की दो बीघा जमीन होती है। शंभू किसी कीमत पर जमीन बेचने को तैयार नहीं होता लेकिन किस तरह चालाकी से उसकी जमीन हड़पता है, यह फिल्म में दिखाया गया है।

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