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14 फीट गहरे 250 मेन होल, माचिस की तीली जलाकर की जाती है जहरीली गैस की पड़ताल

14 फीट गहरे 250 मेन होल, माचिस की तीली जलाकर की जाती है जहरीली गैस की पड़ताल

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भोपाल/ राजधानी में हर तीसरा सीवेज चैंबर उबल रहा है। शहर के 30 फीसदी हिस्से में 50 साल पुराना सीवेज सिस्टम है जो ध्वस्त होने की कगार पर है। सडक़ों पर बहता सीवेज इस समय शहर की सबसे बड़ी समस्या बन गया है। सुप्रीम कोर्ट के बाद अब अमृत प्रोजेक्ट के तहत केंद्र ने मैन्युअली सफाई पर रोक लगा दी। नगर निगम-पीएचई बीते सालों में सीवेज नेटवर्क की सफाई पर कोई नीति नहीं बना पाए। 10 साल से अधिक पुरानी मशीनों व उपकरणों से ही काम चला रहे हैं।

राजधानी में करीब 2000 किमी लंबा सीवेज नेटवर्क है। इसमें करीब 600 किमी का नेटवर्क पीएचई के पास है, बाकी की जिम्मेदारी नगर निगम की है। इसमें 14 फीट गहराई के 250 से अधिक मेनहोल है, जबकि आठ फीट व इससे कम के 5000 मेनहोल है। जब भी लाइन चॉक होती है तो उसे साफ करने कर्मचारियों को गहराई में उतारा जाता है।

हैरानी ये हैं कि जहरीली गैसों से भरे इन चैंबर में गैस की पड़ताल करने माचिस की तिली का उपयोग किया जाता है। मिथेन गैस हो जो वह जल जाती है। कर्मचारी को गैस से बचाने आसपास के पांच से छह मेन ***** खोले जाते हैं। खुले में जहरीली गैस छोड़ी जाती है, जिससे आसपास के पूरे वातावरण को नुकसान होता है। गौरतलब है कि गैस मॉस्क, गैस डिटेक्टर जैसे संसाधन नहींहै।

ये हैं निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में आदेश जारी किया था कि बिना सुरक्षा उपकरण किसी को सीवेज मेनहोल-चैंबर में न उतारा जाए। 2017 तक कर्मचारियों को जरूरी उपकरण नहीं दिए गए। फिर सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में आदेश जारी कर निजी व प्रायवेट हर सेक्टर के बारे में कहा कि बिना सुरक्षा उपकरण सीवेज की सफाई कराना अपराध है। इसके बाद अमृत प्रोजेक्ट के तहत अभी नवंबर 2019 में 45 उपकरणों की सूची जारी की और निर्देशित किया कि मैन्युअली की बजाय पूरी तरह से मशीनीकृत तौर पर ही सीवेज की सफाई हो।

सीवेज नेटवर्क: तीन भाग- तीन जिम्मेदार

1. पीडब्ल्यूडी- सरकारी मकानों की सभी कॉलोनियों में अंदरूनी सीवेज लाइन नेटवर्क पीडब्ल्यूडी के जिम्मे हैं।
संसाधन- कोई संसाधन नहीं है। कुछ कर्मचारी है जो शिकायत मिलने पर मैन्युअली ही सफाई करते हैं।
इनका कहना- पीडब्ल्यूडी के अधीक्षण यंत्री वीके आरक का कहना है कि हमारा बड़ा नेटवर्क नहीं है। सफाई में दिक्कत नहीं आती।

2. पीएचई- सरकारी मकानों की कॉलोनियों से निकले इंटरनल सीवेज नेटवर्क को आगे बढ़ाने के लिए पीएचई की लाइन है। चार इमली, 74 बंगला, शिवाजी नगर, तुलसी नगर, 45 बंगला, टीटी नगर, अरेरा कॉलोनी ई1 से ई5 तक, कोहेफिजा, ईदगाह हिल्स, बड़ा तालाब किनारे की कॉलोनियां बैरागढ़, सीहोर नाका से नेहरू नगर तक का पूरा नेटवर्क, छोटा तालाब किनारे पोलीटेक्रिक चौराहा, श्यामला हिल्स, प्रोफेसर कॉलोनी, जहांगीराबाद का सिस्टम पीएचई के जिम्मे हैं।

संसाधन - शहर के कुल सीवेज नेटवर्क का 30 फीसदी पीएचई के पास है। इसमें अरेरा कॉलोनी का नेटवर्क 50 साल पुराना है तो 45 बंगला क्षेत्र का 40 साल पुराना। जहांगीराबाद, बैरागढ़, नेहरूनगर का 15 साल पुराना है। इसके लिए महज दो सकिंग मशीनें। दस इंजीनियर और 200 कर्मचारी है। यहां का सीवेज ट्रीट करने के लिए 23 पंप हाउस व छह ऑक्सीडेशन पोंड है। कोटरा, नईजेल के सामने मोहली दामखेड़ा, अयोध्या बायपास, बैरागढ़, 11 नंबर पर शिवम हॉस्पिटल के पीछे ऑक्सीडेशन पोंड है, जिसमें ट्रीटमेंट हुआ पानी जाता है।

इनका कहना- पीएचई के कार्यपालन यंत्री एसके चतुर्वेदी का कहना है कि संसाधन बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। कम संसाधनों के बावजूद हमारी लाइन की शिकायतें बेहद कम रहती है।

3. नगर निगम- सरकारी आवास, छोटा-बड़ा तालाब किनारे के क्षेत्रों को छोडकऱ शहर का 70 फीसदी नेटवर्क नगर निगम का है। इसमें कोलार, होशंगाबाद रोड, चूनाभट्टी, अरेरा कॉलोनी ई6 से ई8, गुलमोहर, शाहपुरा, गोविंदपुरा विधानसभा क्षेत्र की कॉलोनियां, टीला जमालपुरा, करोद, भानपुर, अयोध्या बायपास समेत सभी क्षेत्र है।

संसाधन- निगम के पास शहर का 70 फीसदी सीवेज नेटवर्क का जिम्मा है। इसके लिए 23 सकिंग मशीनें, 25 इंजीनियर और 250 कर्मचारी है। हैरानी ये कि इतने बड़े नेटवर्क का जिम्मा संभालने के बावजूद एक भी पंप हाउस नहीं है, ऑक्सीडेशन पोंड नहीं है। सीवेज सीधे नाले में छोड़ी जा रही है।

इनका कहना- निगमायुक्त विजय दत्ता के अनुसार हम नए पंप हाउस बनवा रहे हैं। कॉलोनियों में एसटीपी लगवाने की कवायद की जा रही है। नई मशीनों की खरीदी और कर्मचारियों को उपकरण भी दे रहे हैं। मैन्युअली काम पूरी तरह से बंद कराया जाएगा।

इनका कहना

अभी जो मशीनें है वे दस साल पुरानी है। चैंबर में ईंट, रेत, मिट्टी को नहीं खींच पाती, इसलिए कर्मचारी को मेलहोल में उतारना ही पड़ता है। अभी नई मशीनें करीब एक करोड़ रुपए की है जो ईंट-पत्थर पर खींच लेती है, लेकिन भोपाल में नहीं है। शहर में इस तरह की कम से कम पांच मशीनें चाहिए। - आरके त्रिवेदी, इंजीनियर व भोपाल में सीवेज लाइन के एक्सपर्ट