19 जनवरी 2026,

सोमवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

महाकुंभ : जानें उज्जैन में क्यों लगता है ‘सिहंस्थ’

देश में हर 12 साल में एक बार आयोजित किए जाने वाले महाकुंभ की ये फैक्ट जानकर हैरान हो जाएंगे आप...

3 min read
Google source verification

image

sanjana kumar

Apr 15, 2016

inside story know when sadhus fight for religion,

inside story know when sadhus fight for religion, how to reach ujjain, hindu culture, religious, river in madhya pradesh, news, simhastha updates, ujjain, kumb, simhastha kumb, know about ujjain, madhya pradesh news in hindi

भोपाल। 22 अप्रैल से शुरू होने वाले सिंहस्थ की लगभग सभी तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। पर क्या आप जानते हैं उज्जैन में लगने वाला यह महाकुंभ दुनिया का सबसे बड़ा मेला कहलाता है। इस महाकुंभ का नाम सिंहस्थ क्यों पड़ता...आइए हम बताते हैं देशभर में आयोजित किए जाने वाले महाकुंभों के बारे में कुछ ऐसे ही रोचक फैक्ट....

सिंह राशि ने बनाया सिंहस्थ
उज्जैन में लगने वाले इस महाकुंभ का नाम सिंहस्थ इसलिए पड़ा क्योंकि इस दौरान गुरु सिंह राशि में होता है। चारों महाकुंभों में सिंहस्थ ही ऐसा महाकुंभ है जिसे दुनिया का सबसे बड़ा कुंभ मेला कहा जाता है। एक महीने चलने वाला यह मेला इस बार 22 अप्रैल से 21 मई तक चलेगा।

कहां-कहां आयोजित किए जाते हैं ये महाकुंभ
देशभर में आयोजित किए जाने वाले महाकुंभ का मेला इलाहबाद, उज्जैन, नासिक और हरिद्वार में आयोजित किए जाते हैं। जहां लाखों श्रद्धालु डुबकी लगाने पहुंचते हैं। ये चारों ही शहर धार्मिक रूप से महत्व रखते हैं। माना जाता है कि इन महाकुंभों में पवित्र नदियों में स्नान से हम पापों से मुक्त हो जाते हैं। आपको यह जानकर भी हैरानी होगी कि हिन्दू धर्म की इस परम्परा की शुरुआत महाभारत काल से ही हो चुकी थी।

महाकुंभ का रोचक इतिहास

माना जाता है कि शैवपुराण की ईश्वर संहिता व आगम तंत्र से संबद्ध सांदीपनि मुनि चरित्र स्तोत्र के अनुसार, महर्षि सांदीपनि काशी में रहते थे। एक बार प्रभास क्षेत्र से लौटते समय वे उज्जैन आए। उस समय यहां कुंभ मेले का समय था। लेकिन उज्जैन में भयंकर अकाल के कारण साधु-संत बहुत परेशान थे। तब महर्षि सांदीपनि ने भगवान शिव की तपस्या की। उनकी तपस्या से खुश हुए शिवजी ने अकाल को समाप्त कर दिया। उन्होंने महर्षि से इसी स्थान पर रहकर विद्यार्थियों को शिक्षा देने के लिए कहा। महर्षि ने वैसा ही किया। यही कारण है कि आज उज्जैन में महर्षि सांदीपनि का आश्रम भी है। मान्यता यह भी है कि इसी आश्रम में भगवान कृष्ण और बलराम ने भी शिक्षा प्राप्त की थी।

स्नान के लिए होती हैं विशेष तिथियां

सिंहस्थ के दौरान स्नान के लिए विभिन्न तिथियां निश्चित होती हैं। माना जाता है कि इन तिथियों में स्नान करने से पापों का नाश होता है। उज्जैन में चैत्र मास की पूर्णिमा से सिंहस्थ का शुभारंभ होता है और पूरे मास में वैशाख पूर्णिमा के अंत तक अलग-अलग तिथियों में स्नान किया जाता है। उज्जैन में सिंहस्थ के लिए सिंह राशि पर बृहस्पति, मेष में सूर्य, तुला राशि का चंद्र आदि ग्रह-योग जरूरी माने जाते हैं।

यहां गिरी थीं अमृत की बूंदें

जिन चार शहरों में प्रत्येक 12 साल में विशेष ज्योतिषीय योग बनने पर कुंभ मेला लगता है, उनके बारे में मान्यता है कि देवासुर संग्राम के दौरान इन्हीं 4 स्थानों पर अमृत की बूंदें गिरी थीं। धार्मिक गं्रथों के अनुसार एक बार एक बार देवताओं व दानवों ने मिलकर अमृत प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन किया। मदरांचल पर्वत को मथनी और वासुकी नाग को रस्सी बनाकर समुद्र को मथा गया। समुद्र मंथन से 14 रत्न निकले। अंत में भगवान धन्वंतरि अमृत का घड़ा लेकर प्रकट हुए। अमृत कुंभ के निकलते ही देवताओं और दैत्यों में उसे पाने के लिए लड़ाई छिड़ गई। ये युद्ध लगातार 12 दिन तक चलता रहा। इस लड़ाई के दौरान पृथ्वी के 4 स्थानों (प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक) पर कलश से अमृत की बूंदे गिरी। लड़ाई शांत करने के लिए भगवान ने मोहिनी रूप धारण कर छल से देवताओं को अमृत पिला दिया। अमृत पीकर देवताओं ने दैत्यों को मार भगाया। काल गणना के आधार पर देवताओं का एक दिन धरती के एक साल के बराबर होता है। इस कारण हर 12 साल में इन चारों जगहों पर महाकुंभ का आयोजन किया जाता है।

ऐतिहासिक परम्परा को शंकराचार्य ने किया व्यवस्थित

ज्योतिषियों और विद्वानों का मानना है कि कुंभ मेले की परंपरा युगों से चली आ रही है। लेकिन आदि शंकराचार्य ने इसे व्यवस्थित रूप दिया। उन्होंने चार मुख्य तीर्थों पर चार पीठ स्थापित किए, फिर इन चार तीर्थ स्थानों पर कुंभ मेले में साधुओं की भागीदारी भी सुनिश्चित की। उनके साधु और संत आज भी शिष्यों समेत कुंभ में शामिल होते हैं।

ये भी पढ़ें

image