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सीता ने बचपन में मां से सुनी कहानियां, जातीय अनुष्ठानों को देखा, सुनी हुई कथाएं को चित्रों में उकेरा

सीता मेड़ा के चित्रों की प्रदर्शनी 'शलाका 23' का प्रदर्शन

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सीता ने बचपन में मां से सुनी कहानियां, जातीय अनुष्ठानों को देखा, सुनी हुई कथाएं को चित्रों में उकेरा

भोपाल। मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय के 'लिखन्दरा दीर्घा' में रानापुर में जन्मी सीता मेड़ा के चित्रों की प्रदर्शनी 'शलाका 23' का प्रदर्शन किया जा रहा है। यह चित्रकला प्रदर्शनी आज 03 मार्च से 30 मार्च, 2022 तक जारी रहेगी। प्रदर्शित चित्र विक्रय हेतु भी उपस्थित रहेंगे, जिन्हें चित्रकार से क्रय किया जा सकता है। प्रदर्शनी में चित्रकार के बनाये 24 चित्रों को प्रदर्शित किया गया है। इन चित्रों में एक्रेलिक कलर का प्रयोग कर कैनवास और पेपर पर उकेरा गया है। इनके चित्रों में गल बापसी, नृत्य करता मयूर, हिरण एवं वृक्ष, गातला पूजन, महुआ बनाते ग्रामीण, भील बारात, पिठौरा देव, भराड़ी, वर्षा हेतु मन्नत मांगते ग्रामीण, शिकार करते बगुले, गोह जोड़ एवं कीट पतंगे, हिरण एवं शिकारी, वृक्ष बैल एवं पक्षी, हिरण एवं भील युगल, हल जोतता किसान एवं अन्य कई विषय देखने को मिलते हैं।

बातचीत में चित्रकार सीता ने बताया कि उनका जन्म वर्ष 1885 में मध्यप्रदेश के भील बहुल क्षेत्र झाबुआ के ग्राम रेतालुन्जा, तहसील रानापुर में हुआ है। मध्यप्रदेश में यह क्षेत्र अल्पवर्षा का क्षेत्र है, जहाँ प्रकृति ने स्वयं यहाँ के निवासियों को कठिन श्रम करने का साहस एवं प्रेरणा दी है। ज़्यादातर भील स्त्रियाँ पारंपरिक नृत्य के इतर भी अपनी कलात्मक अभिव्यक्तियाँ चित्रों के माध्यम से भी व्यक्त कर पाने में बहुत हद्द तक सफल भी हुई हैं। सीता मेड़ा ने भी बहुत छोटी उम्र से घर में अपनी माँ जो कि अब एक प्रतिष्ठित भील चित्रकार भी हैं, को समय-समय पर घर को सुन्दर अलंकरण करते देखा और उनसे कला को विरासत में पाया। समय -समय पर अपने घर को सुंदर आकर्षक बनाने के उद्देश्य से सीता माँ एवं भाई बहनों के साथ अलंकरण का काम करती थी। बचपन में माँ से सुनी कहानियाँ, जातीय अनुष्ठानों को देखना उसके पीछे की कथा को जानने की उत्कंठ इच्छा भी रही ही आई और सुनी हुई कथाएं सीता के मस्तिष्क में अपना स्थान बनाने लगीं।

गाँव से लेकर शहर तक का सफर सीता एवं परिवार के लिए बहुत संघर्षपूर्ण रहा और इन्होंने जीवटता से समस्त कठिनाइयों का डट कर मुकाबला भी किया। विवाह उपरान्त सीता एक बार पुन: पारिवारिक संघर्षो एवं आर्थिक अभावों से जूझते हुए पति शरद मेड़ा के साथ मजदूरी का कार्य करने लगी और शाम के समय समस्त कार्यो से निबट कर चित्रकारी करती। चित्रकर्म में पति का सम्पूर्ण सहयोग मिला, धीरे-धीरे शरद भी सीता के संग चित्रकर्म करने लगे एवं सीता को मजदूरी छोड़ केवल चित्र ही बनाने के लिए प्रेरित भी करने लगे। बचपन में सुनी कथाओ, माता पिता के साथ मनाये गए तीज त्योहारों, अनुष्ठानो एवं उनके महत्व सम्बंधित कथाओं को सीता ने अपने मस्तिष्क में जैसे संचित कर लिया एवं उन्हें अपने चित्रों में अपनी चित्रगत शैली में सहजता से चित्रित करने लगी। सीता को अपने चित्रों में कथाओ को कहना अधिक प्रिय है साथ वन्य जीव जगत कीट पतंगे इनके चित्रों में अपना स्थान पाते हैं। चटक रंगों से चित्र एवं उनमे छोटी-छोटी बुंदकियाँ इनके चित्रों को आकर्षक बनाती हैं।