
सुष्मित बीटेक कर चुके हैं। एक साल में तीन नौकरियां बदल चुके हैं। उनका किसी चीज में मन नहीं लगता। धैर्य जल्दी जवाब दे जाता है। किसी फैसले पर देर तक टिक नहीं पाते। ऐसी ही हालत बबीता की है। वे पहले ऑफिस से आने के बाद लॉन में घूमती थीं। बाजार जाती थीं। पड़ोसियों से बातें करती थीं, अब फोन लेकर बैठ जाती है। कभी ईमेल, कभी फेसबुक, एक्स तो कभी रील देखती हैं। एकाग्रता फिर भी नहीं। राजधानी भोपाल के
सैकड़ों लोग हर पल बदलते ख्यालों से परेशान हैं। एक निर्णय पर न टिक पाने से वे तनाव में हैं। सामाजिक और पारिवारिक रिश्ते खराब हो रहे हैं। मानसिक चिकित्सकों के पास ऐसे 30 फीसदी लोग पहुंच रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि यह पॉपकॉर्न ब्रेन सिंड्रोम है। यह बीमारी सोशल मीडिया और डिजिटाइजेशन से यह बढ़ रही है।
सोशल ट्रेंड में
डॉक्टरों के अनुसार, 2011 में वॉशिंगटन विश्वविद्यालय के रिसर्चर डेविड लेवी ने इस समस्या को पॉपकॉर्न ब्रेन नाम दिया। 19 फरवरी को 'पॉपकॉर्न ब्रेन' शब्द सोशल मीडिया पर ट्रेंड करता रहा।
बच्चों के लिए घातक
जीवन में धैर्य और किसी मुद्दे या फैसले पर ठहराव प्रमुख कुशलता है। डिजिटाइजेशन इसे छीन रहा है। बच्चों के लिए यह ज्यादा घातक है। वे पढ़ाई या किसी विषय पर ज्यादा देर टिक नहीं पा रहे। एक रिपोर्ट बताती है, 2004 में व्यक्ति ढाई मिनट तक एक चीज पर स्थिर रहता था। अब 30 से 40 सेकंड पर आ गया।
बेहतर और सस्ता उपाय अखबार पढऩा
पॉपकॉर्न ब्रेन सिंड्रोम का बड़ा दुष्प्रभाव बेचैनी की समस्या है। लंबे समय तक ध्यान एकाग्र कर लोग किताबें व अखबार नहीं पढ़ पा रहे। इससे बचने का बेहतर उपाय पढ़ाई ही है। सबसे बेहतर और सस्ता उपाय अखबार पढऩा है।
एक्सपर्ट व्यू
ओपीडी में एक माह में 1000 लोग फोन एडिक्शन से मानसिक बीमार होकर आ रहे हैं। इनमें 30 फीसदी का ब्रेन तेजी से एक से दूसरी चीज पर चला जाता है। यह पॉपकॉर्न ब्रेन सिंड्रोम है। लोगों को बाहर की दुनिया में निकलना होगा।
-डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी, मनोचिकित्सक
Updated on:
21 Feb 2024 12:33 pm
Published on:
21 Feb 2024 07:52 am
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