आलविलक्कू की रोशनी से जगमगाया मानव संग्रहालय

14 दिन पहले ही मनाया जा रहा है मानव संग्रहालय का 43 वां स्थापना दिवस

By: hitesh sharma

Published: 10 Mar 2019, 09:05 AM IST

भोपाल। होली पर्व के कारण कलाकारों की व्यस्यता के चलते इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय की ओर से अपना 43 वां स्थापना दिवस पर 14 दिन पहले ही मनाया जा रहा है। जबकि हर साल स्थापना दिवस समारोह 21 से 23 फरवरी तक मनाया जाता है। संग्रहालय में इस तीन दिवसीय स्थापना दिवस समारोह की शुरुआत पूर्वोत्तर राज्यों के हाथ से बुनकर कपड़े बनाने के हैंडलूम का पारम्परिक कपड़ा बुनकर की गई। कार्यक्रम में सबसे बड़ा आकर्षण 1001 दियों से प्र"ावलित होने वाला केरल का आलविलक्कू (विशाल दीप) रहा, जिसे देखने शाम को बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। इस दौरान आलविलक्कू की जगमगाहट के बीच सुमधुर लोक संगीत ने माहौल में रस घोल दिया।

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यह विशाल दीप इस लिहाज से खास है क्योंकि 14 फीट ऊंचे इस दीपक को जलाने के लिए 18 लीटर तेल लगता है। परंपरा के अनुसार, इस दीपक को पूरे रीति-रिवाजों के साथ प्र"वलित किया गया। इसके लिए मलयाली समाज के लोग अपने पारंपरिक परिधानों में पहुंचे। दीपक के आसपास गुलाब, गेंदे और नीम की पत्तियों से बनाई आकर्षक रंगोली भी बनाई गई थी। करीब 15 मिनट में ही एक हजार आठ सौ किलो वजनी, 14 फीट ऊंचा और 1001 दिए वाला यह दीपक पूरी तरह से जगमगाने लगा।

पूर्वोत्तर राज्यों में बाउंड्री मार्कर्स हैं महिलाएं
'पूर्वोत्तर भारत की महिलाएं : योगदान और चिंतन' पर राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रो. सुभद्रा मित्रा चानना ने कहा कि हमारा समाज पुरुष प्रधान होने के कारण नारीवादी दृष्टिकोण की आमतौर पर अनदेखी की जाती है। पूर्वोत्तर राज्यों के समाजों में महिलाएं बाउंड्री मार्कर्स हैं, जिन पर जनजाति की पूरी प्रतिष्ठा टिकी हुई है और अक्सर इसे महिलाओं की सांस्कृतिक रूप से विपरीत छवि उत्पन्न होती है और यहां एक प्रतीकात्मक हिंसा के सामान है। डॉ. रेखा सिंघल ने कहा कि उत्तर-पूर्व एकमात्र ऐसा राज्यों है जिसमें निजी वनों, सामुदायिक स्वामित्व व समाज की सुरक्षा के लिए अलग-अलग सामुदायिक कानून हैं, जो देश की सर्वश्रेष्ठ जैव विविधता वाले राज्यों के रूप में जाने जाते हैं।

पारम्परिक कलाकारों का हुआ सम्मान
इस दौरान संग्रहालय को अपनी कर्म भूमि बनाने वाले कर्मनिष्ठ और सादगी के मिसाल पारम्परिक कलाकार श्रवण पासवान, वंदना टेटे, बंदी उरांव और पी. सत्यनारायण और किरणबाला शर्मा को शाल, श्रीफल, प्रतीक चिन्ह व प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया। वहीं कार्यक्रम के मुख्य अतिथि स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर के निदेशक डॉ. एन. श्रीधरन ने कहा कि मानव संग्रहालय ने समय के साथ इस भूखंड को संस्कृति के एक महत्वपूर्ण स्थान में परिवर्तित कर दिया है, मैंने विश्व में बहुत सारे संग्रहालयों का अवलोकन किया है पर यह पहला संग्रहालय है जो अपने प्रत्येक क्रियाकलापों से समुदाय को अवगत करता है और समुदाय के लोग इस संग्रहालय को अपने पुरखों की थाती और अपना दूसरा घर मानते हैं। संग्रहालय में पूर्वोत्तर राज्यों के पारंपरिक व्यंजनो पर केन्द्रित फ़ूड फेस्टिवल और पूर्वोत्तर राज्यों की पारंपरिक कला व शिल्प पर आधारित क्राफ्ट फेयर भी आयोजित किया गया है।

टेट्सिओ सिस्टर्स ने फ्यूजन संग सुनाया नागालैंड का फोक
इसके बाद पूर्वोत्तर राज्यों के सांस्कृतिक उत्सव में टेट्सिओ सिस्टर्स द्वारा फोक फ्यूजन संगीत की प्रस्तुति दी गई। नागालैंड की सांस्कृतिक विरासत के सुरीले अतीत में एक नया अध्याय जोडऩे वाली टेट्सियों सिस्टर्स ने नाग जनजातीय समुदाय की सदियों पुरानी वाचिक परंपरा से जुड़े गीतों और कथाओं का गहन अध्ययन किया और अपने कंठ तथा स्मृति में रचा-बसा कर उन्हें प्रस्तुत करने का सिलसिला शुरू किया। टेट्सियों सिस्टर्स ने एकतारा और गिटार की धुन पर उम्मीदों, सपनों, संघर्षों, संस्कारों और प्यार को समाए गीत पेश किए। यह नागालैंड के जीवन, प्रकृति और संस्कृति का सुंदर विन्यास है।

hitesh sharma Reporting
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