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आईएएस अफसर और मप्र सरकार में ठनी, जानें क्या है विवाद की वजह

आखिरकार सरकार ने आईएएस को हटाकर इंजीनियरिंग कॉलेज के प्रोफेसर को पदस्थ कर दिया। पहले भी एेसे मामले सामने आए।

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Juhi Mishra

Dec 28, 2016

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भोपाल। राज्य सरकार में पावर को लेकर नया विवाद शुरू हो गया है। विवाद आईएएस और विभागीय अफसरों का है। अफसर नहीं चाहते कि अधिकार कम हों, इसलिए वे विभागीय पद छोडऩा नहीं चाहते हैं, जबकि आईएएस की नजर विभाग अध्यक्ष पदों पर है। हाल में तकनीकी शिक्षा में विभागीय अफसर को हटा आईएएस को बैठाने का तीखा विरोध हुआ।

आखिरकार सरकार ने आईएएस को हटाकर इंजीनियरिंग कॉलेज के प्रोफेसर को पदस्थ कर दिया। पहले भी एेसे मामले सामने आए। जहां विरोध हुआ वहां कदम पीछे खींचे, जहां समझाइश से काम हो गया वहां आईएएस का कब्जा बरकरार रहा। अब अधिकांश विभागों में आयुक्त का पद गठित किया और आईएएस बैठा दिया। इसमें स्वास्थ्य, स्कूल शिक्षा, उच्च शिक्षा, महिला बाल विकास, आदिम जाति कल्याण, तकनीकी शिक्षा, कृषि विभाग प्रमुख हैं। विभागों में पहले संचालक के पद थे, संचालक विभागीय अफसर ही होता था, लेकिन आयुक्त का पद गठित होने से आईएएस पदस्थ होने लगे।

चिकित्सा शिक्षा में भी बना ली जगह
अन्य विभागों की तरह राय सरकार ने चिकित्सा शिक्षा विभाग में आयुक्त पद की पदस्थापना तो कर दी, लेकिन यहां आईएएस की पदस्थापना नहीं की। संचालक के तौर पर पदस्थ विभागीय अफसर को ही आयुक्त का अतिरिक्त प्रभार दिया गया, लेकिन दो दिन पूर्व यह परम्परा भी टूट गई। आईएएस मनीष रस्तोगी को विभाग का आयुक्त पदस्थ कर दिया गया।

पटवा के दौर में शुरुआत
सुंदरलाल पटवा के सीएम रहते नया प्रयोग शुरू हुआ। निर्माण विभागों में आईएएस की पदस्थापना की गई। उस दौरान सचिव ही बड़ा अफसर होता था। पीएस का पद निर्मित हुआ तो यह पद आईएएस को दिया गया और सचिव पद पर विभागीय अफसर पदस्थ होने लगे।

गलत परम्परा
मप्र राजपत्रित अधिकारी संघ के अध्यक्ष इंजी.अशोक शर्मा कहते हैं कि एचओडी तो विभागीय अधिकारी होना चाहिए, आईएएस मंत्रालय की कमान संभालें। विभागों में आईएएस बैठाने से अधिकारी हतोत्साहित होते हैं। सरकार सिर्फ कहती है, पर अमल नहीं किया।

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