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पत्रिका सर्वे: राहत नाकाफी, अन्नदाता नाखुश

छोटे किसानों को तो यह भी नहीं मालूम कि उनके लिए कौन-कौन सी योजनाएं हैं।

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Juhi Mishra

Dec 19, 2015


भोपाल। शासन की योजनाओं का लाभ चुनिंदा किसानों को ही मिल पा रहा है। छोटे किसानों को तो यह भी नहीं मालूम कि उनके लिए कौन-कौन सी योजनाएं हैं। राजधानी में बैठे कृषि विभाग के अफसर निरीक्षण करने तो केवल उन खेत पर जाते हैं, जहां स्थानीय अधिकारी उन्हें लेकर जाते हैं। किसान सोयाबीन की फसल नष्ट होने के कारण परेशान हैं। कर्ज लेकर रबी की बोवनी की, तो सिंचाई के लिए बिजली नहीं मिल रही है। जिन गांवों में बिजली की व्यवस्था सही है, उनमें लंबे समय तक कटौती की जा रही है। यानी मात्र 6 घंटे ही बिजली सप्लाई की जा रही है। कई गांवों के ट्रांसफार्मर खराब हैं।

50 करोड़ बांटने का दावा
छिंदवाड़ा जिले के सोयाबीन पीला मोजेक रोग क्षति और सूखा प्रभावित करीब 1.30 लाख किसानों को मुआवजे के लिए राज्य शासन ने 67.59 करोड़ रुपए आवंटित किए थे। इनमें से 50 करोड़ 89 लाख रुपए किसानों के खातों में पहुंचाने का दावा जिला प्रशासन ने किया है। जिले की 11 तहसीलों में तामिया में सबसे खराब स्थिति है, जहां केवल 48 फीसदी किसानों को ही राहत राशि पहुंची है।

सिवनी जिले के किसानों का सोयाबीन से मोहभंग हो गया। अब प्रशासन की सलाह के बाद मक्का और धान की खेती के प्रति रुचि दिखा रहे हंै। जिले के किसानों को 186 करोड़ रुपए के लोन दिए गए हैं। किसानों के लिए राहत की बात यह हो सकती है कि जिले की सभी 8 तहसीलों को सूखा प्रभावित घोषित कर दिया गया है। पहले सात तहसीलें सूखाग्रस्त घोषित हुईं थीं।

वसूली के लिए सख्त प्रशासन
सिवनी में जिला प्रशासन ने सहकारी समितियों को ऋण वसूली में तेजी लाने के निर्देश दिए हैं। पिछले साल घंसौर में एक बड़ा घोटाला सामने आया था, जिसमें फर्जी कागजातों के आधार पर कई किसानों का मुआवजा हड़प लिया गया था। बाद में हुई कार्रवाई में कई किसानों को जेल भेज दिया गया था। इसी तरह बरघाट को बाद में सूखा प्रभावित घोषित तब किया गया जब एक किसान ने खुदकुशी कर ली। बालाघाट जिले में अधिकारियों ने गांवों का दौरा किया था। फसलों की स्थिति देखी। रिपोर्ट शासन को सौंप दी। सर्वे रिपोर्ट के आधार पर शासन ने 2 करोड़ 62 लाख रुपए की राहत राशि तो दी, लेकिन उसका वितरण नहीं हो पाया। सर्वे में छह विकासखंड के 3774 किसानों की फसल प्रभावित है।

प्रीमियम से कम मिल रहा है बीमा
किसानों ने फसल बीमा के लिए जितनी प्रीमियम राशि जमा की, उससे कम बीमा मिल रहा है। यानी किसानों द्वारा जमा की गई राशि तक बीमा राशि के रूप में किसानों को नहीं मिल पा रही है। किसानों की इस दुर्दशा के लिए कोई उनकी आवाज नहीं उठा रहा है। दरअसल, किसान प्रत्यक्ष रूप से बीमा का प्रीमियम जमा नहीं करता है। जैसे ही किसान अपना केसीसी लोन लेता है, बैंक उस राशि से बीमा की प्रीमियम काटकर किसान को देती है। फिलहाल किसानों को पिछले साल की बीमा राशि मिल रही है। छिंदवाड़ा जिले के लिए शासन ने दीपावली के पहले सोयाबीन रोग क्षति और सूखे के नाम पर 67.59 करोड़ रुपए का मुआवजा पैकेज जारी किया, लेकिन एक माह बाद भी यह राशि तामिया के दूरवर्ती गांवों में नहीं पहुंच पाई। तामिया तहसील मुख्यालय से 60 किमी दूर ग्राम परतला, खापाढाना, बिसरागुढ़ी, रजौला, दैहर, कोसमी, चारगांव, मानेगांव, खमंतरा, बोदलकछार, हरकपुरा समेत आसपास के गांवों के हालात का जायजा यहां पहुंचकर लिया जा सकता है। बारिश न होने से ये गांव सूखे की चपेट में है।

सीएम के निर्देश थे, पर सूची चस्पा नहीं की
द मोह जिले के किसान तुषार, पाला, ओला व सूखा की मार झेल रहे हैं। जिला सूखा घोषित कर दिया गया और करोड़ों की राशि राहत रूप में एक माह पहले दी गई। विडंबना यह है कि यह राहत राशि किसानों को अब तक नसीब नहीं हुई है। किसानों ने रबी की बोवनी साहूकारों से कर्ज लेकर की है। जिले के कुछ क्षेत्रों में पानी की कमी के चलते फसलें नहीं बोई गईं। कुमेरिया, सरकखड़ी के किसानों में शामिल परषोत्तम पटैल, हीरा पटैल, योगराज सिंह ठाकुर, गजेन्द्र पटैल, राजाराम विश्वकर्मा ने बताया है कि उन्होंने अपने खेत में सिर्फ इतनी ही बोवनी की है कि उनके परिवार के भरण पोषण के लिए गेंहू-चना हो जाए।

शहडोल के गांवों में सीएम के निर्देश के बावजूद सर्वे सूची चस्पा नहीं की गई। शहडोल संभाग में प्रभावित किसानों के जो आंकड़े बताए जा रहे थे वे सभी अनुमानित थे। पिछले कुछ दिनों से प्रशासनिक अमला मैदानी स्तर पर जाकर गांवों की स्थिति जान रहा है, जिसके बाद शासन को बताए गए आंकड़ों में गिरावट देखी जा रही है। 839 गांवों की सर्वे सूची चस्पा करनी थी। शहडोल और अनूपपुर जिले के सैकड़ों गांवों में इन दिनों मैदानी अमला घूम-घूमकर किसानों के बैंक खाते नंबर एकत्रित कर रहे हैं। पटासी के कृषक मोहन पटेल ने बताया कि अभी दो दिन पहले राजस्व विभाग के कर्मचारी गांव से किसानों के खाते नंबर ले गए हैं।

आधे ही खेत में पड़ा दाना
खेतों में नमी की कमी से दलहन और तिलहन की फसलों पर जोर कटनी के कई किसान गेहूं की बोवनी नहीं कर पा रहे हैं। जिले में मात्र 57.4 प्रतिशत बोवनी हो सकी। उधर, किसान सूखा राहत राशि से भी वंचित हैं, जिससे साहूकारों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। खेतों में नमी की कमी के कारण किसानों ने दलहन और तिलहन की खेती पर जोर देना शुरू कर दिया है। पिछले कई वर्षों से मौसम में चल रहे उतार-चढ़ाव के कारण सरकार क्राफ्ट पैटर्न में बदलाव की कोशिश में है।

सूखने लगे तालाब
जिले के तालाब सूखने लगे हैं। कई तालाबों में सिंचाई योग्य पानी नहीं बचा है। बोरिंग भी दम तोड़ रहे हैं। रीठी, बरही, ढीमरखेड़ा व बहोरीबंद स्थित लगभग 225 तालाबों में से 75 सूखने की कगार पर पहुंच गए हैं। रीठी स्थित 28 में मात्र 8 प्रतिशत पानी बचा है। बरही की हालत और खराब है। यहां 47 तालाबों में मात्र 5 फीसदी पानी शेष है। ढीमरखेड़ा के 70 तालाबों में औसत 17 व बहोरीबंद के 89 जलाशयों में लगभग 24 प्रतिशत पानी शेष बचा है। सुगवा, चिखला, बोल्हा, करहिया, लक्ष्मण, देवलिया, सुरखी, जगुआ, घंघरी, देवसरी समेत कई तालाब सूख गए। प्रदेश के कई जिलों के गांवों से ऐसी तस्वीर सामने आई है। वहीं, खरीफ फसलों के मारे कर्ज में डूबे कई किसान रबी की फसल की बोवनी ही नहीं कर सके। उनके खेत उनके हाथों की तरह खाली हैं। शहडोल में सौ फीसदी लोगों ने कहा, फसल बीमा का पैसा समय से नहीं मिलता। नर्मदापुरम के 51 फीसदी लोगों ने किसानों की आत्महत्या के लिए सरकारों को ठहराया जिम्मेदार।

यहां के 77.2 फीसदी लोगों का कहना है कि कृषि विभाग के अफसर कभी खेतों पर नजर नहीं आते। वहीं, 67.8 फीसदी लोग किसानों की आत्महत्या के मामले में केंद्र सरकार और प्रदेश सरकार की नीतियों को दोषी मानते हैं। यहां 74 फीसदी लोगों का मानना है कि फसल बीमा का पैसा कभी समय से नहीं मिला। जब पैसे की जरूरत रही, तब तो कतई नहीं मिला। वहीं 46 फीसदी लोगों का मानना है कि उन्हें खाद-बीज समय से मिल रहा है। हालांकि 54 फीसदी लोगों ने इससे इनकार किया है।

यहां के 78 फीसदी लोगों ने साफ कहा है कि कृषि विभाग के अफसर खेतों पर नजर नहीं आते हैं। एेसे में खेती के उन्नयन और विकास की क्या बात होगी। वहीं, सात फीसदी लोग ही यहां एेसे मिले जिनका मानना है कि उन्हें फसल बीमा का पैसा समय से मिल जाता है। यहां के 20 फीसदी लोगों का मानना है कि उन्हें समय से खाद-बीज मिल जाता है। जबकि 80 फीसदी लोगों ने इससे इनकार किया है। जबकि 70 फीसदी लोगों का कहना है कि वह सरकारी खरीदी से संतुष्ट नहीं हैं।

यहां के 28.3 फीसदी लोग किसानों की आत्महत्या के मामले में प्रदेश सरकार को दोषी मानते हैं। जबकि केंद्र सरकार को 20 और दोनों को दोषी मानने वाले 51.7 फीसदी लोग हैं।
यहां के 31.6 फीसदी लोगों का कहना है कि उन्हें सरकारी खाद-बीज समय से उपलब्ध हो रहा है। हालांकि बाकी ने इससे इनकार किया है। जबकि पांच फीसदी एेसे लोग भी हैं जो मानते हैं कि किसानों की आत्महत्या के पीछे वह खुद ही जिम्मेदार हैं। यहां के 20 फीसदी लोग किसानों की आत्महत्या के लिए केंद्र-राज्य सरकार के अलावा किसानों को भी बराबर का जिम्मेदार ठहराते हैं। जबकि 37 फीसदी लोग एेसे हैं जो सिर्फ दोनों सरकारों को ही कसूरवार मान रहे हैं।

यहां 51 फीसदी लोग एेसे हैं जो किसानों की आत्महत्या के लिए दोनों सरकारों को जिम्मेदार मानते हैं। जबकि 80 फीसदी लोगों का कहना है कि अफसर खेतों पर दिखाई भी नहीं देते हैं।
यहां 36.2 फीसदी लोगों का मानना है कि कृषि विभाग के अफसर खेतों पर नजर आते हैं। जबकि 63.8 फीसदी लोग इससे इनकार करते हैं। 3.1 फीसदी लोग किसानों की आत्महत्या के पीछे उन्हें ही जिम्मेदार मानते हैं। बाकी के लोग दोनों सरकारों को मानते हैं।

बागवानी को बनाया लाभ का धंधा
भोपाल. खरीफ और रबी की फसल से लगातार हो रहे नुकसान के बाद जिले के किसान बागवानी और सब्जी की खेती करने की ओर रुख करने लगे हैं। किसानों को शासन की ओर से भी बढ़ावा मिला है। जिले में प्रत्येक गांव में औसतन एक किसान ने बागवानी शुरू कर दी है। इसमें मुख्यत: जामफल, संतरा एवं नींबू की खेती पर किसानों का ध्यान है। इसके अलावा कुछ किसान सब्जी में प्याज, लहसुन की खेती करने में जुट गया है।

टांडा में रचा कीॢतमान
बैरसिया तहसील के एक किसान ने प्याज की खेती कर यह साबित कर दिया है कि खेती लाभ का धंधा बन सकती है। ग्राम टांडा के गुलाब सिंह गुर्जर के पास 22 एकड़ जमीन है। इन्होंने एक हेक्टेयर में प्याज की खेती की थी, जिसमें 500 क्विंटल प्याज की फसल निकली है। जिसे उन्होंने करीब साढ़े पांच लाख रुपए में बाजार में बेचा है। इस नए प्रयोग के बाद आसपास के किसानों में एक उम्मीद की किरण जाग गई है, क्योंकि एक हेक्टेयर में सभी खर्चे काट कर शायद ही किसी फसल में साढ़े पांच लाख रुपए की बचत होती है। इस किसान ने वापस अपनी जमीन में प्याज लगाई है।

फोन पर सुलझाते हैं किसानों की समस्याएं
शाजापुर कृषि विज्ञान केंद्र के कृषि वैज्ञानिक वर्ष में 300 से ज्यादा दिन गांव-गांव जाकर किसानों की मदद करते हैं। केंद्र पर तीन वैज्ञानिक सात साल से दोनों जिले (शाजापुर+आगर) के किसानों की समस्या का निराकरण कर रहे हैं। दोनों जिलों में करीब 1150 गांव हैं। कृषि विज्ञान केंद्र के प्रमुख एवं वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉ. राजीव उमठ, वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉ. जीआर अंबावतिया और कृषि वैज्ञानिक डॉ. एके मिश्रा गांवों में जाकर किसानों से सीधा संवाद करते हैं। करीब एक साल से कृषि वैज्ञानिक डॉ. एसके धाकड़ भी किसानों की समस्या का निराकरण करने में लगे हुए हैं। ग्राम बेदारनगर, तिलावद, मंडलखां, बटावदा, पटलावदा आदि के किसानों ने बताया कि उन्हें कृषि वैज्ञानिकों की सलाह या मदद की जब जरूरत होती है, मिल जाती है। कृषि वैज्ञानिक फोन पर भी फसलों के संबंध में जानकारियां दी जाती है।

इन्होंने लगा दिए अनार

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देवास जिले के किसानों का कहना है कि फसलों की बढ़वार रुकने से इस वर्ष उत्पादन पर असर पड़ सकता है। खरीफ व रबी सीजन की पारंपरिक फसलों को छोड़ जिले में कुछ किसान अब फल, फूल व सब्जी की खेती करने लगे हैं।पीपलरावां के सतीश व सुशील नाहर ने अपनी पथरीली बंजर भूमि पर दो वर्ष पहले अनार की खेती शुरू की है। सूखी दिखने वाली पहाड़ी पर अनार की खेती दिखाई देने लगी है। इसकी एक बार की फसल दो लाख से अधिक रुपए में बिकेगी।

बर्बादी की एक तस्वीर यह भी
चौराहों पर खड़े होकर किया सर्वे
अनूपपुर के गांव अगरियानार के ठाकुर सिंह ने कहा कि हमें सर्वे वाले कुछ कर्मचारी आए थे। चौराहों बैठे-बैठे हम कुछ ग्रामीणों से गांवों की चौहद्दी ली और कुछ ग्रामीणों के नाम पूछे और चलते बने। जाते जाते कह दिया कोई पूछे तो कह देना सर्वे हो गया है। जिले के कई गांवों के किसानों का कहना है कि सूखे का सर्वे चौराहों पर खड़े होकर किया गया। राहत राशि कागजों में बांट दीं। किसान खाली हाथ हैं। उनकी फसल इस तरह बर्बाद हुई, अगरियानार ग्राम पंचायत के 300 किसानों ने खरीफ फसल की बोयी थी। मौसम ने करवट बदली तो सूखे की मार पड़ी। धान, सोयाबीन, अरहर, उड़द सहित सैकड़ों एकड़ में बोयी कई कई फसलें बर्बाद हो गईं। जिले को सूखा प्रभावित घोषित कर शासन ने 74 करोड़ 51 लाख रुपए मुआवजा देने को कहा था। प्रशासन ने सभी किसानों को राहत राशि के चैक व खाते में डालने की बात कहते हुए 60 करोड़ बांटने का ऐलान किया कर दिया, लेकिन किसान खाली हाथ हैं। अगरियानार के जगदेवलाल सिंह को राहत राशि नहीं मिली। अब कर्ज चुकाने के लिए उनके दोनों बेटे मजदूरी कर रहे हैं, लेकिन दो माह में स्थानीय समूह बैंक के 15 हजार रुपए नहीं चुका सके।

खेतों में पड़ा सूख रहा गन्ना
नरसिंहपुर जिला मुख्यालय के पास का गांव समनापुर के किसान निहाल पटेल की गन्ने की फसल 20 दिन से कटी पड़ी है। गन्ना सूखकर डंठल जैसा हो रहा है, पर शुगर मिल में उसकी तुलाई के आसार नजर नहीं आते। कुछ दलाल भी घूम रहे हैं। हाकमसिंह पटेल के खेत में भी कटा हुआ गन्ना 10 दिन से पड़ा है। रोशनसिंह पटेल का गन्ना करीब 12 दिन बमुश्किल तोला गया। गांव के ही अन्य किसानों के भी यही हाल हैं। किसान बाबूलाल पटेल ने बताया कि बारिश नहीं होने से गन्ना पहले से ही कुछ सूखा था। सूखते गन्ने का वजन आधा रह गया है। एक एकड़ खेत में पिछले साल करीब 350 क्विंटल गन्ना निकला था जबकि, इस बार अधिकतम 150 क्विंटल गन्ना ही निकल रहा है। किसानों को वजन कम होने से घाटा होता है।

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