22 जनवरी 2026,

गुरुवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

मानवीय संवेदनाओं को झकझोरता नाटक ‘कन्यादान’

शहीद भवन में नाटक 'कन्यादान' का मंचन....  

2 min read
Google source verification
news

मानवीय संवेदनाओं को झकझोरता नाटक 'कन्यादान'

भोपाल। शहीद भवन में चल रहे विभा मिश्र स्मृति नाट्य एवं सम्मान समारोह के अंतर्गत सोमवार को नाटक 'कन्यादान' का मंचन किया गया। विजय तेंदुलकर द्वारा लिखित नाटक का निर्देशन शिवकांत वर्मा ने किया। इसका हिन्दी अनुवाद बसंत देव ने किया है। नाटक के माध्यम से समाज में फैले जातिगत भेदभाव पर प्रहार किया गया। ये दिखाया गया कि लोग आदर्शवादी बातें करते हैं, लेकिन सहयोग करने की बात आती है तो पीछे हटते नजर आते हैं। नाटक में दिखाया गया कि आजादी के इतने लंबे समय बाद भी समाज में जाति-वर्ण भेद खत्म नहीं हुआ है। डेढ़ घंटे के इस नाटक में ऑनस्टेज आठ कलाकारों ने काम किया है।

ज्योति को एक दलित युव अरुण अठवाले से प्यार हो जाता है

नाटक की कहानी की शुरुआत समाजवादी कार्यकर्ता नाथ देवलालीकर होती है। उसकी बेटी ज्योति को एक दलित युव अरुण अठवाले से प्यार हो जाता है। वह शादी का प्रस्ताव परिवार के सामने रखती है। देवलालीकर इसे स्वीकार कर लेता है। यह बात ज्योति की मां सेवा मुखर्जी को पसंद नहीं आती। वह सामाजिक कार्यकर्ता है, लेकिन परिवार में आ रहे इस परिवर्तन को स्वीकार नहीं करना चाहती। दो विचारधाराओं के बीच अंर्तविरोध शुरू हो जाता है। एक तरफ समाज में परिवर्तन की बात करती हैं, लेकिन एक दलित युवक से बेटी की शादी होने के खिलाफ खड़ी हो जाती हैं।

पिता के आदर्शों पर चलती है बेटी
ज्योति और अरूण की शादी के कुछ दिन बाद उनकी लड़ाई शुरु हो जाती है। वह शराब के नशे में उससे मारपीट करने लगता है। उसने मन में जातिभेद आ जाता है। वह पति का घर छोड़कर पिता के घर आ जाती है। वहीं अरूण एक पुस्तक के विमोचन के लिए ज्योति के पिता को अध्यक्ष के रूप में बुलाते हंै। इस दौरान वह भाषण देता है जिसकी समीक्षा उनकी बेटी करती है, जिसके बाद वह अरुण के पास वापस चली जाती है।