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अनुपम मिश्र: सादगी ऐसी कि खुद काटते थे बाल, अफ्रीका में भी हुआ नाम

प्रख्यात पर्यावरणविद् और गांधीवादी अनुपम मिश्र नहीं रहे। उन्होंने सोमवार तड़के दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में अंतिम सांस ली।

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gaurav nauriyal

Dec 19, 2016

anupam mishra passes away

anupam mishra passes away

भोपाल. प्रख्यात पर्यावरणविद् और गांधीवादी अनुपम मिश्र नहीं रहे। उन्होंने सोमवार तड़के दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में अंतिम सांस ली। वह 68 वर्ष के थे। अनुपम मिश्र के परिवार के एक करीबी सूत्र ने बताया कि वे पिछले 8 महीने से कैंसर की बीमारी से जूझ रहे थे। मूलरूप से मध्य प्रदेश के टिगरिया से ताल्लुक रखने वाले मिश्र का जन्म 1948 में महाराष्ट्र के वर्धा में हुआ था। उनके पिता भवानी प्रसाद मिश्र ख्यात कवि थे।

अनुपम मिश्रा का एमपी के होशंगाबाद से नाता रहा है। अनुपम मिश्र का अपना कोई घर नहीं था। वह गांधी शांति फाउंडेशन के परिसर में ही रहते थे। मिश्र के परिवार में उनकी पत्नी, एक बेटा, बड़े भाई और दो बहनें हैं। मिश्र गांधी शांति प्रतिष्ठान के ट्रस्टी एवं राष्ट्रीय गांधी स्मारक निधि के उपाध्यक्ष थे।

पिता को बुलाते थे 'मन्ना'
अनुपम मिश्रा को सादगी उनके पिता भवानी प्रसाद मिश्रा से मिली ये कहना गलत नहीं होगा। भवानी प्रसाद मिश्र खुद एक गांधीवादी थे। अनुपम मिश्र की सादगी का अंदाज़ आप इसी बात से लगा सकते हैं कि वो अपने बाल खुद काटते थे। इसका जिक्र उन्होंने पिछले कुछ साल पहले भवानी प्रसाद मिश्र के सहस्त्राब्दी वर्ष पर हुए एक कार्यक्रम में किया था। उन्होंने कहा था कि उनके पिता ने उन्हें बाल काटने सिखाए। वो अपने पिता को 'मन्ना' कहकर बुलाते थे।

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'पानी' और 'पर्यावरण' पर किया काम
अनुपम मिश्र पर्यावरण पर काम शुरू करने वाली शुरूआती शक्सियतों में से एक रहे। जब उन्होंने इस दिशा में काम करना शुरू किया तब सरकार में पर्यावरण जैसा कोई विभाग तक नहीं था। अनुपम गांधी शांति प्रतिष्ठान के जिस कक्ष में रहते थे उसका नाम 'पर्यावरण कक्ष'। दिलचस्प पहलू ये भी है कि इसी कमरे से आपातकाल के दौरान जयप्रकाश नारायण की गिरफ्तारी भी हुई थी। उन्होंने जयप्रकाश नारायण के साथ दस्यु उन्मूलन आंदोलन में भी सक्रियता से काम किया।

अनुपम के तालाब आज भी हैं खरे
'आज भी खरे हैं तालाब' अनुपम मिश्र की पॉपुलर किताब है। इस किताब का 30 से ज्यादा भाषाओं में अनुवाद हुआ है। इस किताब की लोकप्रियता का अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं कि कई जगहों पर उनकी इस किताब से प्रेरित होकर लोगों ने जल संरक्षण का कार्य शुरू किया। इतना ही नहीं पूर्वी अफ्रीका में उनकी इस किताब को पढ़कर एक शख्स ने स्थानीय लोगों के साथ मिलकर काम शुरू किया और उसके बेहद पॉजिटिव परिणाम उन्हें मिले। इसके अलावा फ्रांस की एक संस्था ने उन्हें 2 साल फ़्रांस में रहकर रिसर्च करने की पेशकश की थी, जिसे अनुपम ने भारत से ज्यादा दिनों तक बाहर न रह पाने की बात कहकर महज 2 महीने का ही समय दिया था। इसके अलावा 'राजस्थान की रजत बूंदे' भी उनकी चर्चित किताब रही है।

'लापौडिया' गाँव और 'उफरैंखाल' उदाहरण
जयपुर-अजमेर रोड पर लापौडिया गाँव और उत्तराखंड में उफरैंखाल अनुपम मिश्र के काम का जीता जागता उदाहरण है। दोनों ही जगह एक दौर में पानी के संकट से जूझ रही थी, लेकिन आज यहाँ पर पर्याप्त मात्र में पानी मौजूद है। उन्होंने पर्यावरण और जल सरंक्षण को लेकर राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के कई गाँवों का भ्रमण भी किया था।

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भाषा पर थी अच्छी पकड़
अनुपम मिश्र एक साधारण जीवनशैली जीने वाले गांधीवादी के अलावा अपनी मजबूत भाषा को लेकर भी पहचाने जाते थे। उन्होंने पर्यावरण के साथ भाषा पर बहुत काम किया। उन्होंने लम्बे समय तक प्रतिष्ठान की पत्रिका'गांधीमार्ग' का संपादन भी किया। वो कहते थे 'सरल' लिखना ज्यादा 'मुश्किल' है। वो एक बेहतरीन अनुवादक भी माने जाते थे।

प्रभु पर किया था कटाक्ष
जिस दौर में केंद्रीय मंत्री सुरेश प्रभु ने 'नदी जोड़ो परियोजना' की शुरुआत की थी, तब अनुपम ही वो शख्स थे जिन्होंने अपने विरले अंदाज़ में इस योजना की मुखालफत की थी। उन्होंने कहा था एक 'प्रभु' जोड़ने का काम करता है और एक 'प्रभु' तोड़ने का। वो इस तरह की योजनाओं के पक्षधर नहीं थे। उनको करीब से जानने वाले बताते हैं कि वो कभी भी राजनीतिक मसलों पर सीधे कमेंट नहीं करते थे।

बच्चों से था लगाव
पर्यावरण के अलावा उन्हें बच्चों से भी बेहद लगाव था। वो बच्चों को कागज़ से बनी हुई चीज़ें देते थे। इतना ही नहीं वो बच्चों को तसल्ली से कभी-कभार पेपर क्राफ्ट की जानकारी भी देते थे। उनका कहना था कि प्रकृति ने जो भी दिया है वो वेस्ट नहीं जाना चाहिए।

सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि
अनुपम मिश्रा के निधन की सूचना मिलते ही सामजिक कार्यकर्ताओं और पर्यावरणप्रेमियों में दुःख की लहर दौड़ गयी। भोपाल के सामजिक कार्यकर्ता प्रशांत दुबे ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए लिखा- 'सुप्रसिद्ध पर्यावरणविद अनुपम मिश्र यानी हम सभी होशंगाबदियों के अनुपम भाई आज नहीं रहे।

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