
भोपाल। एडमायर थियेटर ग्रुप के पांच दिवसीय आजादी अमृत नाट्य महोत्सव के तीसरे दिन प्रसन्न सोनी लिखित और निर्देशित नाटक 'और चिडिय़ा शेर बन गई' का ऑनलाइन प्रसारण किया गया। नाटक एक राजनीतिक व्यंग्य है, यह जात-पात की एकता या अन्य तिकड़मों के सहारे देश की सत्ता पाने वाले नेताओं पर कटाक्ष करता है, जो नेता कमजोरी और नाकामी हमेशा जनता पर लादते हैं। ये नाटक जनता में लोकतंत्र की ताकत से जुड़ी चेतना का प्रसार भी करता है।
चुनाव से होगा शेर का चयन
नाटक में दिखाया गया कि एक बार जंगल के देवता ये फरमान जारी करते हैं कि अब से कोई भी परमानेंट शेर नहीं होगा। जानवर चाहें तो अपनी मर्जी से मतदान के आधार पर किसी भी जानवर को शेर चुन सकते हैं यानी अब जंगल का राजा चुनाव के आधार पर तय होगा। सभी को लगने लगता है कि अब उन्हें भी शेर बनने का मौका मिलेगा। कुत्ता, सियार और उल्लू अपनी-अपनी जातियों में बंट जाते हैं, चुनाव में अपनी जाति के प्रत्याशियों को उतारते हैं। संख्या बल और बहुमत के आधार पर उल्लू चुनाव जीतकर जंगल का नया शेर बन जाता है। वह फरमान जारी करता है कि चूंकि मुझे सिर्फ रात को दिखाई देता है इसलिए अब से जंगल के सभी काम दिन की जगह रात को होंगे। दिन में सभी जानवर सोएंगे।
चिडिय़ा जीतकर बन जाती है शेर
चिडिय़ा इस बात का विरोध करती है तो सभी उस पर हंसते हैं। कुछ समय बाद पुराने शेर ने खुद तो चुनाव लडऩे से मना कर दिया लेकिन चिडिय़ा को शेर बनाने की पैरवी कर दी। जंगल में दोबारा चुनाव हुए। चुनाव के पूर्व उल्लू ने जंगल में डर का माहौल बनाया। चिडिय़ा पर जानलेवा हमले कराए लेकिन अंत मे चिडिय़ा चुनाव जीतकर शेर बन जाती है और कुशलता से जंगल का राज चलाने लगती है।
Published on:
30 Aug 2021 11:03 pm
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