भोपाल हाट में स्टेट हैंडलूम एक्सपो......
भोपाल। भोपाल हाट में स्टेट हैंडलूम एक्सपो का शुभारंभ मप्र हस्तशिल्प एवं हथकरघा विकास निगम के प्रमुख सचिव मनु श्रीवास्तव और आयुक्त अनुभा श्रीवास्तव ने किया। एक्सपो में जम्मू-कश्मीर से आए मोहम्मद आसिफ पश्मीना साड़ी लेकर आए हैं, जो महिलाओं के बीच आकर्षण का केंद्र बनी है। इसकी खासियत यह है कि एक साड़ी को बनाने में छह से सात साल का समय लगता है। जिसे ऑर्डर देकर ही बनाया जाता है। वे बताते हैं कि एक साड़ी की कीमत ढाई लाख से लेकर 35 लाख रुपए तक की होती है। इस साड़ी को बुनकरों हाथ से ही डिजाइन करते हैं। साथ ही आकर्षक डिजाइन डाली जाती है।
जलाने के बाद नहीं निकलता काला धुआं
आसिफ ने बताया कि पशुओं से प्राप्त रेशों में सबसे अच्छा रेशा पश्मीना का माना गया है जो कश्मीर और तिब्बत में पाई जाने वाली बकरियों से प्राप्त होती है। पश्मीना के धागे की सबसे बड़ी खासियत होती है कि इसे जलाने पर काला धुंआ नहीं निकलता। जबकि सिंथेटिक या अन्य वुलन को जलाने पर काला धुंआ निकलता है। इसकी स्मेल भी बहुत अलग होती है। एक धागे को जलाकर असली पश्मीना की पहचान की जा सकती है। असली पश्मीना बेहद मुलायम होता है।
पश्मीना शाल इतनी महंगी क्यों होती है?
चेगू नस्ल की बकरी से लगभग हर साल 100 ग्राम और चंगतानी नस्ल की बकरी से 250 ग्राम पश्मीना ऊन प्राप्त होता है। यहबकरी कठिनजलवायु में पाई जाती है तथा एक बार एकबकरी से बहुत कम उन प्राप्त होता है,तथा एक शाल को बनाने में 180 घण्टे लगते हैं। इसलिए यह शाल महंगी मिलतीहै । भारत और चीन के पठार पर स्थित चांगथांग का विशाल रेगिस्तान हिमालय और काराकोरम पर्वत श्रृंखलाओं के मध्य स्थित है। यह अत्यंत दुर्लभ चांगरा बकरी यहां पाई जाती है, जिसे हम पश्मीना बकरी के नाम से भी जानते हैं। पश्मीना ऊन की बनी वस्तुओं के दीवाने भारत ही नहीं, बल्कि दुनियां के अन्य लोग भी हैं।
बालों की मोटाई चांगरा बकरी के बाल की चौड़ाई महज 12 माइक्रान होती है जो इंसानी बालों से करीब आठ गुना पतले होते हैं। एक सामान्य भेड़ की ऊन से आठ गुना ज्यादा गर्म होते हैं। इस शानदार रेशे को पश्मीना के रूप में जाना जाता है, जो दुनिया में सबसे नर्म और सबसे महंगी कश्मीरी ऊन है। यहां के चांगपा खानाबदोश इन बकरियों को पालते हैं।
बड़ी पश्मीना शाल को बनाने के लिए तीन नस्ल के बकरों से प्राप्त ऊन का प्रयोग किया जाता है और एक बकरे से लगभग 80 से 170 ग्राम तक ऊन प्राप्त हो जाती है.कश्मीरी कारीगर कई पीढिय़ों से प्रसिद्ध पश्मीना शॉल बनाने का काम करते हैं, जो हाथ से बुने जाते हैं और कभी-कभी इनमें बेहतरीन एम्ब्रॉयडरी भी की जाती है। पश्मीना की शाल की मांग भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी इसकी मांग अधिक होने के कारण इसमें नए नए प्रयोग किए जा रहे हैं।