
भोपाल। जनजातीय संग्रहालय में बुद्धत्व की कथाओं के रंग महोत्सव पर केंद्रित यशोधरा में मंगलवार को जातक कथाओं की प्रासंगिकता पर व्याख्यान का आयोजन किया गया। महोत्सव की इस कड़ी में स्वर्ण हंस जातक पर आधारित नाटक बुद्धायन का मंचन भी हुआ। नाटक का निर्देशन प्रीति झा तिवारी ने किया।
नाटक में दो जातक कथाओं को शामिल किया गया। पहली कथा में तथागत बुद्ध के आदर्शों पर चलने वाले एक योगी की है। वह उस महिला की रक्षा करता है जिसे गांव की नदी से पानी भरने नहीं दिया जाता। योगी प्रताडऩा देने वाले राजा और उसके सहयोगिओं को बुद्ध का उपदेश देकर उनकी आंखें खोल देता है। योगी भूख से व्याकुल शेरनी का भोजन बन अपनी देह का त्याग कर देता है।
मनुष्य की मनुष्यता को समझाती है जातक कथाएं
कार्यक्रम में सत्यदेव त्रिपाठी ने जातक कथाओं की प्रासंगिकता पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि जातक कथाएं असल में दो से ढाई हजार साल पहले लिखी गई थीं। उन्होंने बताया कि जातक कथाएं हमें आदर्श मार्ग दिखाती है। सिर्फ मनुष्य या अवतार रूप में ही नहीं, बल्कि जानवरों के रूप में भी हमें यह कहानियां आदर्श देती हैं। इन जातक कथाओं के माध्यम से हम मनुष्य की पशुता और मनुष्य की मनुष्यता को बड़ी ही आसानी से सहज भाषा में समझ सकते हैं। उन्होंने कहा की बुद्ध असल में संज्ञा नहीं है, बल्कि विशेषण है।
लालच में स्वर्ण हंस के पंख उखाड़ लेता है परिवार
दूसरी कथा बनारस के घाट पर पूजा-पाठ और अनुष्ठानिक कर्म करने वाले ब्राह्मण की है। परिवार को पालने में उसे कष्टों का सामना करना पड़ता है। मृत्यु के बाद वह स्वर्ण हंस के रूप में जन्म लेता है। वह अपने परिवार का हाल जानने पहुंचता है। परिवार को दुखी देख वह व्यथित हो जाता है।
यह दु:ख जब असहनीय हो जाता है तो वह अपने परिवार को अपना परिचित देता है और अपना एक सोने का पंख निकालकर पत्नी को दे देता है। परिवार की स्थिति में सुधार होने लगता है। परिवार में इतना लालच आ जाता है कि पत्नी और बच्चे मिलकर उसके सारे पंख ही उखाड़ देने का हिंसक कार्य कर देते हैं।
Published on:
02 May 2018 07:33 pm
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