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जनजातीय संग्रहालय : नाटक ‘नदी प्यासी थी’का मंचन

अंधविश्वास से पनपती है बलि प्रथा

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भोपाल। मप्र जनजातीय संग्रहालय में शृंखला अभिनयन में शुक्रवार को सरफराज हसन के निर्देशन में यंग्स थिएटर के कलाकारों द्वारा नाटक नदी प्यासी थी का मंचन किया गया। इस नाटक के प्रमुख तीन किरदारों के बीच असफल प्रेम की पीड़ा, सहानुभूति, मित्रता, उदारता, ममता आदि जीवन के भाव गहराई से उभरते हैं।

नाटक के केन्द्र में एक बंगाली परिवार (शंकर और शीला) है, जो बिहार के एक बाढग़्रस्त इलाके में रहता है। यहां हर वर्ष नदी में बाढ़ आती है और यह बाढ़ तब तक नहीं उतरती जब तक की कोई इंसान इस नदी में कूदकर आत्महत्या ना कर ले। यह अन्धविश्वास अब बलि प्रथा बन गया है। एक दिन उनका दोस्त राजेश इलाज कराने आता है। प्रेम में असफलता से उसके जीवन में अर्थ नहीं बचा है।

लव ट्रायएंगल से बिगड़ जाता है मामला

शंकर की सालीपद्मा डॉ. कृष्णा से प्रेम करती है। राजेश के बीमार होने पर डॉ. कृष्णा उसका इलाज कर जान बचाते हैं और पद्मा राजेश की सेवा करती है। अचानक ही पद्मा अपने जीजा के दोस्त राजेश के प्रति उसकी साहित्यिक बातचीत से इतनी प्रभावित हो जाती है कि वो राजेश को दिल ही दिल प्रेम करने लगती है। वहीं राजेश, पद्मा को डॉ.कृष्णा के साथ विवाह के लिए राजी करता है। अविश्वास के कारण डॉ. कृष्णा आत्महत्या कर लेते हैं और नदी से बाढ़ उतर जाती है। यह खबर सुनकर सभी सन्न रह जाते हैं और पद्मा नदी की तरफ भागती है, राजेश उसे पकडऩे दौड़ता है।

वाकणकर की खोज ने बढ़ाया मान

भोपाल के पुरातत्ववेत्ता डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर के जन्म दिवस और जन्म शताब्दी वर्ष कार्यक्रम का आयोजन शुक्रवार को डॉ. नारायण व्यास के कोलार स्थित लघु संग्रहालय में किया गया। इस अवसर पर डॉ. व्यास ने वाकणकर की उपलब्धि पर प्रकाश डाला। विशेष रुप से भीमबैठका के चित्रों की जानकारी दी। डॉ. व्यास का कहना है कि वाकरणकर ने भीम बैठका की खोजकर भोपाल और मप्र का नाम पूरे विश्व में फैलाया है। उनके नाम पर राजधानी में रिसर्च इंस्टीट्यूट भी खोला गया। इस अवसर पर सत्य नारायण शर्मा, इतिहास संकलन समिति, इतिहासकार सूर्यकांत शर्मा, एसके लिमये, डॉ. जोधा, डॉ. आलोक गुप्ता, कोपरगांवकर आदि मौजूद थे।