शोध कार्य ठप हैं, प्रयोगशालाएं खाली पड़ी हैं और नई शिक्षा नीति के लक्ष्य कागजों तक सिमट कर रह गए हैं। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस स्थिति से सरकार, विश्वविद्यालय प्रशासन और नीति निर्धारक सभी परिचित हैं, फिर भी ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे। ऐसा क्यों किया जा रहा है, समझ से परे है। यह कहना गलत नहीं होगा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद यदि नियुक्तियां समय पर नहीं हो रही हैं, तो यह व्यवस्था की उदासीनता को दर्शाता है। आखिर कब तक विद्यार्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ा किया जाता रहेगा? यदि उच्च शिक्षा को सचमुच मजबूत बनाना है, तो नियमित और पारदर्शी नियुक्तियां प्राथमिकता बननी चाहिए। केवल भवन और योजनाएं नहीं, बल्कि योग्य शिक्षक ही शिक्षा की रीढ़ हैं। जब तक खाली पद नहीं भरेंगे, तब तक शिक्षा का स्तर सुधरने की उम्मीद करना महज भ्रम ही रहेगा।