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प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफेसर से लेकर कुलगुरु तक के पद खाली

कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में वर्षों से खाली पड़े शिक्षकों के पदों ने उच्च शिक्षा की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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भोपाल

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Mantosh Kumar Singh

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Updated: 21 Jan 2026, 6:23 PM IST

(फोटोः एआई जनरेटेड)

उच्च शिक्षा किसी भी समाज की बुनियाद होती है। उच्च शिक्षा वह क्षेत्र है, जहां से न केवल कुशल मानव संसाधन तैयार होता है, बल्कि सामाजिक चेतना, शोध और नवाचार की दिशा भी तय होती है। लेकिन विभिन्न विभागों में खाली पदों ने एक बार फिर इस सच्चाई को उजागर किया है कि प्रदेश की उच्च शिक्षा व्यवस्था गंभीर संकट से गुजर रही है। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में बड़ी संख्या में पद वर्षों से खाली हैं। प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफेसर से लेकर प्राचार्य और कुलगुरु जैसे अहम पद लंबे समय से खाली हैं।

न पाठ्यक्रम पूरा हो रहा न मिल रहा मार्गदर्शन

कई विभाग ऐसे हैं जहां एक-एक शिक्षक पर दर्जनों कक्षाओं का बोझ है। इससे न तो पाठ्यक्रम समय पर पूरा हो पा रहा है और न ही विद्यार्थियों को मार्गदर्शन मिल पा रहा है। इसका असर पढ़ाई की गुणवत्ता पर पड़ रहा है। गेस्ट फैकल्टी के सहारे उच्च शिक्षा को जैसे-तैसे चलाया जा रहा है। नियमित नियुक्तियों की प्रक्रिया काफी धीमी है और कई फाइलें वर्षों से दफ्तरों में धूल खा रही हैं। गेस्ट फैकल्टी व्यवस्था को अस्थायी समाधान के तौर पर शुरू किया गया था, लेकिन अब यह स्थायी विकल्प बनती जा रही है। अल्प मानदेय, असुरक्षित भविष्य और शैक्षणिक निर्णयों में सीमित भूमिका के कारण गेस्ट फैकल्टी पूरी क्षमता के साथ काम नहीं कर पाती है। इसका खमियाजा छात्रों को भुगतना पड़ता है।

नियमित और पारदर्शी नियुक्तियां प्राथमिकता हो

शोध कार्य ठप हैं, प्रयोगशालाएं खाली पड़ी हैं और नई शिक्षा नीति के लक्ष्य कागजों तक सिमट कर रह गए हैं। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस स्थिति से सरकार, विश्वविद्यालय प्रशासन और नीति निर्धारक सभी परिचित हैं, फिर भी ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे। ऐसा क्यों किया जा रहा है, समझ से परे है। यह कहना गलत नहीं होगा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद यदि नियुक्तियां समय पर नहीं हो रही हैं, तो यह व्यवस्था की उदासीनता को दर्शाता है। आखिर कब तक विद्यार्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ा किया जाता रहेगा? यदि उच्च शिक्षा को सचमुच मजबूत बनाना है, तो नियमित और पारदर्शी नियुक्तियां प्राथमिकता बननी चाहिए। केवल भवन और योजनाएं नहीं, बल्कि योग्य शिक्षक ही शिक्षा की रीढ़ हैं। जब तक खाली पद नहीं भरेंगे, तब तक शिक्षा का स्तर सुधरने की उम्मीद करना महज भ्रम ही रहेगा।