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जानिए वह कौन सी जगह है जहां 1600 साल पुराने नर वाहर के रहस्य में उलझे हैं विदेशी

प्रतिमा का सिर वराह(सुअर) का है, जबकि शरीर मनुष्य की तरह है। यही कारण है कि विष्णु के इस रूप को नरवराह कहा जाता है। 

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Anwar Khan

Sep 25, 2016

Vidisha Tour

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विदिशा। नगर से मात्र 9 किमी दूर स्थित उदयगिरि पहाड़ी कई ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों को अपने में समेटे है। इस पहाड़ी को उसकी गुफाओं के लिए जाना जाता है। उदयगिरि की 20 गुफाओं में से सबसे दर्शनीय है गुफा नंबर 5, यहां भगवान विष्णु के वराह अवतार की करीब 12 फीट ऊंची प्रतिमा सबसे भव्य और अनूठी है। नरवराह की यह प्रतिमा शिल्प, स्थापत्य, धर्म-संस्कृति और रचनात्मकता का प्रमाण है।

प्रतिमा का सिर वराह(सुअर) का है, जबकि शरीर मनुष्य की तरह है। यही कारण है कि विष्णु के इस रूप को नरवराह कहा जाता है। यहां पहाड़ी की विशाल शिला को शिल्पी ने बड़ी खूबसूरती से तराशा है। शिल्पी ने न सिर्फ भगवान विष्णु के शारीरिक सौष्ठव को बखूबी उत्कीर्ण किया है, बल्कि उनकी स्तुति करते हुए बहुत से देव, गंधर्व और साधुओं सहित समुद्र की लहरों को भी उकेरने का काम भी उसी शिला पर बखूबी कर दिखाया है। ऐसी विशाल और भव्य नरवराह प्रतिमा मप्र में और कहीं नहीं। करीब 1600 साल पुरानी इस प्रतिमा को उदयगिरि की सबसे दर्शनीय गुफा माना जाता है। यह सिर्फ एक प्रतिमा नहीं, बल्कि पूरी कथा सुनाती गुफा है।



चंद्रगुप्त ने पांचवी शताब्दी में कराया था निर्माण
भगवान विष्णु के दस अवतारों में से एक अवतार है वराह अवतार। पृथ्वी को राक्षसों के आतंक से मुक्त कराने के लिए भगवान विष्णु ने वराह(सुअर) के मुंह वाले रूप में अवतार लिया था और राक्षसों द्वारा फैलाई तमाम गंदगी में से पृथ्वी को अपने मुंह से खींचकर उसका उद्धार किया था। गंगा-यमुना ने पृथ्वी को फिर पवित्र किया और देवताओं ने विष्णु के इस लोककल्याणकारी कार्य पर उनकी स्तुति कर पुष्प बरसाए थे। यही पौराणिक कथा 1600 वर्ष पूर्व गुप्त राजवंश के सबसे पराक्रमी राजा चंद्रगुप्त ने विदेशी शक राजाओं पर जीत को यादगार बनाने के लिए उदयगिरि की पहाड़ी पर उत्कीर्ण कराई थी।
कैनवास सा दृश्य चट्टान पर
वराह अवतार लेकर पृथ्वी का उद्धार करने वाली इस कथा को उत्कीर्ण करने के लिए शिल्पी ने न सिर्फ विष्णु के नरवराह रूप को भव्यता से तराशा, बल्कि कथा पूरी करने के लिए मगर पर सवार गंगा, कछुए पर सवार यमुना के स्वरूप बनाए हैं। चरणों में शेषनाग, सामने हाथ जोड़े राजा और समुद्र की लहरों का दृश्य कथा को हकीकत से जोड़ता है। भगवान द्वारा पृथ्वी का उद्धार किया तो देव-मुनि-गंधर्व किस तरह प्रसन्न होकर उनकी जयजयकार करने लगे, इसे भी ब्र?हा, शिव, सरस्वती, पार्वती और तमाम देवी-देवताओं के साथ बारीकी से उकेरा गया है। एक ही शिला पर यह सब देखना ऐसा प्रतीत होता है जैसे कलाकार ने पत्थर की चट्टान पर नहीं बल्कि कैनवास पर इस दृश्य को उकेरा हो।

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