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शरद पूर्णिमा 2019: इस दिन खीर में बरसेगा अमृत, जानिये कैसे बनती है अमृत की खीर...

इस दिन ये एक उपाय कर देगा आपकी हर परेशानी को दूर!

भोपाल

Updated: October 04, 2019 05:32:16 pm

भोपाल। साल में एक बार आने वाली शरद पूर्ण‍िमा ( sharad purnima ) बड़ा ही उत्तम दिन माना जाता है। इस व्रत को करने से सभी मनोकामना पूरी होती है। इसे कोजागरी व्रत के रूप में भी मनाया जाता है।
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पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक इसी दिन मां लक्ष्मी का जन्म हुआ था। इसलिए धन प्राप्ति के लिए यह तिथि सबसे उत्तम मानी जाती है।

इस वर्ष शरद पूर्णिमा ( Sharad Purnima 2019 ) इसी माह 13 अक्टूबर 2019 ( रविवार - sunday ) को मनाई जाएगी। इस दिन चंद्रमा की सोलह कलाओं की शीतलता देखने लायक होती है। यह पूर्णिमा सभी बारह पूर्णिमाओं में सर्वश्रेष्ठ मानी गयी गई है।
अश्विन पूर्णिमा व्रत मुहूर्त:
जानकारों के अनुसार अक्टूबर 13, 2019 को 00:38:45 से पूर्णिमा का आरम्भ होगा, जबकि अक्टूबर 14, 2019 को 02:39:58 पर पूर्णिमा समाप्त।

चंद्रमा इसी दिन सोलह कलाओं का...
आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं। यह रास पूर्णिमा के नाम से भी जानी जाती है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार पूरे वर्ष में केवल इसी दिन चंद्रमा सोलह कलाओं का होता है और इससे निकलने वाली किरणें अमृत समान मानी जाती है।
उत्तर और मध्य भारत में शरद पूर्णिमा की रात्रि को दूध की खीर बनाकर चंद्रमा की रोशनी में रखी जाती है। मान्यता है कि चंद्रमा की किरणें खीर में पड़ने से यह कई गुना गुणकारी और लाभकारी हो जाती है। इसे कोजागर व्रत माना गया है, साथ ही इसको कौमुदी व्रत भी कहते हैं।
भगवान को प्रिय है खीर...
पं. सुनील शर्मा के अनुसार सनातन धर्म में खीर को उच्च कोटि का व्यंजन माना गया है, जो भगवान को प्रिय है।

मान्यता अनुसार शरद पूर्णिमा पर भगवान श्रीकृष्ण का महारास हुआ था और इसी दिन चंद्र देवता ने अमृत की वर्षा की थी।
उसी अमृत रूपी प्रसाद को पाने के लिए इस दिन खुले आसमान के नीचे खीर का प्रसाद रखा जाता है, ताकि चंद्रमा की किरणें खीर पर पड़ सकें। माना जाता है कि यह खीर आने वाले शीत ऋतु के प्रकोप से रक्षा करती है और वात, पित्त एवं कफनाशक होती है।
इसके अलावा पंडित शर्मा के अनुसार मान्यता है कि शरद पूर्णिमा का व्रत करने से संतान दीर्घायु को प्राप्त होती है। शरद पूर्णिमा का व्रत विशेष कर सौभाग्यवती नारियों को करना चाहिए।

व्रत के दौरान कथा एवं चंद्रदेव, तुलसी और भगवान विष्णु का विशेष पूजन-अर्चन किया जाता है। विशेष तौर पर भगवान को खोबा एवं शक्कर से निर्मित 6 लड्डुओं का भोग लगाना चाहिए। जिसमें से एक लड्डू भगवान को, दूसरा पंडित को, तीसरा गर्भवती स्त्री को एवं चौथा सहेली को देने का नियम है।
कर्ज से मुक्ति पाने का दिन Karj Mukti ...
मान्यता है कि इस पूर्णिमा को माता महालक्ष्मी का पृथ्वी पर आगमन होता है। वे घर-घर जाकर सबको वरदान देती हैं, किन्तु जो लोग दरवाजा बंद करके सो रहे होते हैं, वहां से लक्ष्मी जी दरवाजे से ही वापस चली जाती है। तभी शास्त्रों में इस पूर्णिमा को जागर व्रत, यानी कौन जाग रहा है व्रत भी कहते हैं।
इस पूर्णिमा के दिन लक्ष्मी पूजा सभी कर्जों से मुक्ति दिलाती हैं। अतः शरदपूर्णिमा को कर्ज मुक्ति पूर्णिमा भी कहते हैं। इस रात्रि को श्रीसूक्त का पाठ, कनकधारा स्तोत्र, विष्णु सहस्त्रनाम का जाप और भगवान् कृष्ण का मधुराष्टकम् का पाठ ईष्ट कार्यों की सिद्धि दिलाता है और उस भक्त को भगवान् कृष्ण का सानिध्य मिलता है।
ये भी हैं कुछ खास उपाय...
ज्योतिष के जानकार विजय शास्त्री डीएस शास्त्री बताते हैं कि जन्म कुंडली में यदि चंद्रमा क्षीण हों, महादशा-अंतर्दशा या प्रत्यंतर्दशा चल रही हो या चंद्रमा छठवें, आठवें या बारहवें भाव में हो तो चन्द्र कि पूजा और मोती अथवा स्फटिक माला से ॐ सों सोमाय मंत्र का जप करके चंद्रजनित दोष से मुक्ति पाई जा सकती है।
वहीं इसके अलावा जिन्हें लो ब्ल्ड प्रेशर हो, पेट या ह्रदय सम्बंधित बीमारी हो, कफ़ नजला-जुखाम हो आखों से सम्बंधित बीमारी हो वे इस दिन चन्द्रमा की आराधान करके इस सबसे मुक्ति पा सकते हैं।
मान्‍यता है कि यही वो दिन है जब चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से युक्‍त होकर धरती पर अमृत की वर्षा करता है। दरअसल, हिन्‍दू धर्म में मनुष्‍य के एक-एक गुण को किसी न किसी कला से जोड़कर देखा जाता है। माना जाता है कि 16 कलाओं वाला पुरुष ही सर्वोत्तम पुरुष है।
कहा जाता है कि श्री हरि विष्‍णु के अवतार भगवान श्रीकृष्‍ण ने 16 कलाओं के साथ जन्‍म लिया था, जबकि भगवान राम के पास 12 कलाएं थीं। बहरहाल, शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा, माता लक्ष्‍मी (Laxmi Puja) और विष्‍णु जी की पूजा का विधान है।
साथ ही खीर (Sharad Purnima Kheer) बनाकर उसे आकाश के नीचे रखा जाता है। फिर रात 12 बजे के बाद उसका प्रसाद गहण किया जाता है। मान्‍यता है कि इस खीर में अमृत होता है और यह कई रोगों को दूर करने की शक्ति रखती है।
आश्विन पूर्णिमा व्रत और पूजा विधि ( Puja Vidhi ) ...
शरद पूर्णिमा पर मंदिरों में विशेष सेवा-पूजा का आयोजन किया जाता है। इस दिन होने वाले धार्मिक कर्म इस प्रकार हैं-

● प्रातःकाल उठकर व्रत का संकल्प लें और पवित्र नदी, जलाश्य या कुंड में स्नान करें।
● आराध्य देव को सुंदर वस्त्र, आभूषण पहनाएँ। आवाहन, आसन, आचमन, वस्त्र, गंध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, तांबूल, सुपारी और दक्षिणा आदि अर्पित कर पूजन करें।
● रात्रि के समय गाय के दूध से बनी खीर में घी और चीनी मिलाकर आधी रात के समय भगवान भोग लगाएँ।
● रात्रि में चंद्रमा के आकाश के मध्य में स्थित होने पर चंद्र देव का पूजन करें तथा खीर का नेवैद्य अर्पण करें।
● रात को खीर से भरा बर्तन चांदनी में रखकर दूसरे दिन उसका भोजन करें और सबको प्रसाद के रूप में वितरित करें।
● पूर्णिमा का व्रत करके कथा सुननी चाहिए। कथा से पूर्व एक लोटे में जल और गिलास में गेहूं, पत्ते के दोने में रोली व चावल रखकर कलश की वंदना करें और दक्षिणा चढ़ाएँ।
● इस दिन भगवान शिव-पार्वती और भगवान कार्तिकेय की भी पूजा होती है।
शरद पूर्णिमा का महत्व
शरद पूर्णिमा से ही स्नान और व्रत प्रारंभ हो जाते हैं। माताएँ अपनी संतान की मंगल कामना के लिए देवी-देवताओं का पूजन करती हैं। इस दिन चंद्रमा पृथ्वी के बेहद करीब आ जाता है।
शरद ऋतु में मौसम एकदम साफ रहता है। इस समय में आकाश में न तो बादल होते हैं और नहीं धूल के गुबार। शरद पूर्णिमा की रात्रि में चंद्र किरणों का शरीर पर पड़ना बहुत ही शुभ माना जाता है।

शरद पूर्णिमा व्रत कथा ( Vrat Katha ) ...

हिन्दू धर्म के अनुसार पुराने समय में मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु को खुश करने के लिए एक साहूकार की दोनों बेटियां हर पूर्णिमा को व्रत किया करती थीं। दोनों बहनों में से जहाँ बड़ी बहन पूर्णिमा का व्रत पूरे विधि-विधान से करती थी।
वहीं छोटी बहन व्रत तो करती थी लेकिन वो अक्सर नियमों को आडंबर मानकर उनकी अनदेखी कर बैठती थी। विवाह योग्य होने पर साहूकार ने अपनी दोनों बेटियों का विवाह कर दिया।

विवाह के कुछ समय बाद दोनों के घर संतानों ने जन्म लिया. बड़ी बेटी के घर स्वस्थ संतान का जन्म हुआ तो वहीं छोटी बेटी के घर संतान जन्म तो लेती परन्तु पैदा होते ही दम तोड़ देती थी।
ऐसा दो-तीन बार हुआ तब जाकर उसने एक ब्राह्मण को सलाह के लिए बुलाया और अपनी व्यथा कहते हुए उससे धार्मिक उपाय पूछा।

छोटी बेटी की पूरी बात सुनकर ब्राह्मण ने उससे कहा कि तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती हो, इस कारण तुम्हारा व्रत कभी सफल नहीं हुआ और तुम्हें अधूरे व्रत का दोष भी लगता है।
ब्राह्मण की बात सुनकर छोटी बेटी ने उस वर्ष पूर्णिमा व्रत पूरे विधि-विधान से करने का निर्णय लिया, लेकिन पूर्णिमा आने से पहले ही उसने एक बेटे को जन्म दिया और उस बालक ने भी जन्म लेते ही दम तोड़ दिया। बालक की मृत्यु होने पर छोटी बेटी ने बेटे के शव को एक पीढ़े पर रख कर उसपर कपड़ा ढक दिया ताकि किसी को पता न चले।
फिर उसने अपनी बड़ी बहन को अपने घर आमंत्रित किया और बैठने के लिए उसे वही पीढ़ा दे दिया। जैसे ही बड़ी बहन उस पीढ़े पर बैठने लगी, उसकी साड़ी का किनारा बच्चे को छू गया और वह जीवित होकर तुरंत रोने लगा।
ये सब देख बड़ी बहन डर गई और छोटी बहन पर क्रोधित होकर बोलने लगी कि, क्या तुम मुझ पर बच्चे की हत्या का दोष और कलंक लगाना चाहती हो! मेरे बैठने से यह बच्चा मर जाता तो?
ख़ुशी से रोते हुए छोटी बहन ने उत्तर दिया, दीदी यह बच्चा पहले से मरा हुआ था। तुम्हारे तप और स्पर्श के कारण ही यह जीवित हो गया है। तुम जो व्रत पूर्णिमा के दिन करती हो, उसके कारण तुम दिव्य तेज से परिपूर्ण और पवित्र हो चुकी हो।
अब मैं भी तुम्हारी ही तरह पूरी विधि के साथ व्रत और पूजन करूंगी। इसके बाद बड़ी बहन की तरह ही छोटी बहन ने भी पूर्णिमा व्रत विधि पूर्वक किया और इस व्रत के महत्व और फल का पूरे नगर में प्रचार किया।

शरद पूर्णिमा व्रत का महत्व

हिन्दू धर्म के अनुसार शरद पूर्णिमा का मुहूर्त अनुसार विधि-विधान पूर्वक व्रत रखने से सभी मनोकामना पूर्ण होती है जिससे व्यक्ति के सभी दुख दूर हो जाते हैं।
चूंकि इसे कौमुदी व्रत भी कहा जाता है इसलिए ये माना गया हैं कि इस दिन जो विवाहित स्त्रियां व्रत रखती है उन्हें संतान की प्राप्ति होती है।

साथ ही अगर कोई मां इस व्रत को विधि अनुसार अपने बच्चे के लिए करें तो उसकी संतान की आयु लंबी होती है।
जो कोई भी कुंवारी कन्या इस त को रखती हैं तो उसे भी सुयोग्य और उत्तम वर की प्राप्ति होती है।

माना गया हैं कि शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा किसी भी दिन के मुकाबले सबसे ज्यादा चमकीला होता है। इस दिन आसमान से अमृत बरसता है।
शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की किरणों का तेज बहुत होता है जिससे आपकी आध्यात्मिक और शारीरिक शक्तियों का विकास होता है।
शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की किरणों में असाध्य रोगों को दूर करने की क्षमता भी होती है।
शरद पूर्णिमा व्रत विधि ( varat Vidhi ) ...

शरद पूर्णिमा के दिन सुबह इष्ट देव का पूजन करना शुभ होता है।
इस दिन भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी का पूजन करके घर में घी के दीपक जलाकर पूजन करना चाहिए।
इस दिन ब्राह्मणों को खीर का भोजन कराकर उन्हें दान दक्षिणा प्रदान करनी चाहिए।

मां लक्ष्मी को खुश करने के लिए इस व्रत को विशेष रुप से किया जाता है। इस दिन सच्चे भाव से भजन-कीर्तन करके आप धन-संपत्ति में वृद्धि देख सकते है।
पूर्णिमा का व्रत करके रात को चन्द्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही भोजन करना चाहिए।

इस दिन मंदिर में खीर आदि दान करके व्रत को सफल बना सकते है।

कई लोग शरद पूर्णिमा के दिन गंगा व अन्य पवित्र नदियों में आस्था की डुबकी लगाते हैं। मान्यता है कि इस दौरान स्नान-ध्यान के बाद गंगा घाटों पर ही दान-पुण्य करना शुभ होता है।

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