
भोपाल. देश में सबसे ज्यादा सोयाबीन उक्पादक राज्य मध्य प्रदेश है और सोयाबीन का बम्पर उत्पादन करने वाले राज्य के किसानों के लिए ये घाटे का सौदा बनता जा रहा है। किसी भी धंधे का असूल है कि जिस प्रोडक्ट से सबसे ज्यादा नुकसान है तो बदल देना चाहिए। यह बात खेती पर भी लागू होती है और इसे किसानों को समझने की जरुरत है।
सोयाबीन की फसल में पीला मौजक की बीमारी से सबसे ज्यादा नुकसान होने लगा है। वजह है कि किसान की बीज वैरायटी नहीं बदलना चाहता। किसानों की यही जिद सोयाबीन को नुकसान की खेती बना रही है। किसान को यदि सोयाबीन को लाभ की खेती बनाना है तो उन्हें 15 साल पुराना 9560 बीज को छोड़कर नया बीज अपनाने की कोशिश करना ही होगी।
कृषि विभाग के अधिकारियों के मुताबिक ने मालवा के लगभग 70 प्रतिशत से ज्यादा किसान 9560 वैरायटी को बोना पसंद करते हैं। इस वैरायटी में पीला मौजक जैसे वायरस सबसे ज्यादा अटैक होता है। जबकि नई वैरायटी आरवीएस 24, जेएस 2172 वैरायटी, 1135, आरवीएस 18, पीएस 1569, ब्लैक बोल्ट जैसी लेटेस्ट वैरायटियां का बीज भी बाजार में उपलब्ध है। जिसे किसान अपना लें तो सोयाबीन की फसल में आने वाले रोगों से बचाव हो सकता है।
नई वैरायटी के उपयोग से किसान सोयाबीन को उन्नत खेती बना सकते हैं। लेकिन देखने में आया है कि नई वैरायटियां अपनाने वाले किसानों की संख्या केवल 10 से 25 प्रतिशत ही है। किसानों को बीज बदलने के लिए कृषि विभाग के अधिकारी भी लगातार प्रेरित कर रहा है। मगर लाख कोशिशों के बावजूद किसानों का पुरानी वैरायटी से मोह नहीं छूट रहा। जिसका खामियाजा उन्हें नुकसानी के रुप में उठाना पड़ रहा है।
ढलान वाले खेतों में ज्यादा नुकसान
जानकारों का कहना है कि ढलान वाले खेतों के लिए 9560 किस्म का बीज नुकसानदेह है। पानी जमा होने व नमी ज्यादा रहने से इस बीज में वायरस अटैक लगना स्वाभाविक है। अभी जिन खेतों से वायरस अटैक की शिकायतें आ रही है। उनमें अधिकांश खेत ढलान वाले ही है। कृषि विस्तार अधिकारी, राजेंद्र शर्मा ने कहा कि 9560 किस्म वैरायटी का उपयोग करने वाले खेतों से वायरस अटैक की सबसे ज्यादा शिकायतें आ रही है। बीज बदलने पर किसानों को लगातार प्रेरित किया जा रहा है।
Published on:
03 Sept 2022 08:09 pm
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