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महात्मा गांधी ने सरदार पटेल को क्यों नहीं बनने दिया पहला प्रधानमंत्री?

भोपाल।  क्या देश के प्रथम प्रधानमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल हो सकते थे, कई कांग्रेसी भी चाहते थे कि  वे ही  प्रधानमंत्री बनें, लेकिन महात्मा गांधी ने उन्हें  नहीं चुना। यह प्रश्न मध्यप्रदेश गठन के बाद से चला आ रहा है। आइए जानते हैं कि सरदार वल्लभ भाई पटेल के एक कामयाब प्रशासक होने के बावजूद […]

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Alka Jaiswal

Dec 28, 2015


भोपाल। क्या देश के प्रथम प्रधानमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल हो सकते थे, कई कांग्रेसी भी चाहते थे कि वे ही प्रधानमंत्री बनें, लेकिन महात्मा गांधी ने उन्हें नहीं चुना। यह प्रश्न मध्यप्रदेश गठन के बाद से चला आ रहा है।

आइए जानते हैं कि सरदार वल्लभ भाई पटेल के एक कामयाब प्रशासक होने के बावजूद आखिर गांधी ने उन्हें प्रधानमंत्री के पद के लिए क्यों नहीं चुना?

यह सब जानते हैं कि भारत के लौह पुरुष के रूप में पहचाने जाने वाले सरदार पटेल एक दृढ़प्रतिज्ञ राजनेता थे जिसके कारण कांग्रेस का हर एक सदस्य उन्हें देश के प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहता था। लेकिन इतनी खूबियां और काबलियत होने के बावजूद उन्हें देश का प्रधानमंत्री नहीं चुना गया। इसके पीछे की वजह जानने के लिए हम चलते हैं सन् 1946 में...

1946 में जैसे-जैसे भारत को आजादी मिलने की उम्मीदें बढ़ रहीं थी वैसे-वैसे कांग्रेस के द्वारा सरकार के गठन की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी थी। सभी की निगाहें कांग्रेस के अध्यक्ष के पद पर टिकी हुई थीं क्योंकि ये लगभग तय हो चुका था कि जो कांग्रेस का अध्यक्ष बनेगा वही भारत के प्रधानमंत्री के पद के लिए भी चुना जाएगा। भारत छोड़ो आंदोलन का हिस्सा बनने के कारण कांग्रेस का ज्यादातर नेता जेल में थे। छह साल से अध्यक्ष पद का चुनाव ना हो पाने के कारण मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने ही कांग्रेस के अध्यक्ष पद की कमान संभाली हुई थी।

1946 में अध्यक्ष पद के लिए चुनाव होने थे, मौलाना आज़ाद भी इस चुनाव नें भाग लेना चाहते थे और साथ ही प्रधानमंत्री भी बनने के इच्छुक थे। लेकिन महात्मा गांधी के साफ मना कर देने के बाद उन्हें यह विचार छोड़ना पड़ा। मौलाना आजाद को मना करने के साथ-साथ गांधी ने ये जाहिर कर दिया था कि उनका समर्थन नेहरू के साथ है।

29 अप्रैल 1946 अध्यक्ष पद के लिए नामांकन भरने की आखिरी तारीख थी। इस नामांकन में सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि नेहरू को गांधी के समर्थन के बाद भी राज्य की कांग्रेस समिति द्बारा समर्थन नहीं मिला। सिर्फ इतना ही नहीं, 15 राज्यों में से करीबन 12 राज्यों ने सरदार पटेल को कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में प्रस्तावित किया और बाकी 3 राज्यों ने किसी का भी समर्थन नहीं किया। 12 राज्यों द्बारा मिला समर्थन सरदार पटेल को अध्यक्ष बनाने के लिए काफी था।

गांधी चाहते थे कि नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष पद को संभाले इसलिए उन्होंने जे बी कृपलानी पर दबाव डाला कि वे कांग्रेस कार्य समिति के कुछ सदस्यों को नेहरू को समर्थन देने के लिए राज़ी करें। गांधी के दबाव में कृपलानी जी ने कुछ सदस्यों को इस बात के लिए मना भी लिया। नेहरू को समर्थन दिलवाने के लिए जो भी गांधी कर रहे थे वो कांग्रेस के संविधान के खिलाफ था। सिर्फ इतना ही नहीं, इसके बाद गांधी ने सरदार पटेल से मुलाकात कर कांग्रेस अध्यक्ष पद के उम्मीदवार की दौड़ से हट जाने का निवेदन किया। सरदार पटेल सारी कूटनीति को समझते हुए भी कांग्रेस की एकता बनाए रखने के लिए गांधी का ये निवेदन स्वीकार कर लिया जिसके कारण नेहरू प्रधानमंत्री के पद के उम्मीदवार बन गए।

नेहरू प्रधानमंत्री तो बन गए लेकिन इससे एक सवाल पैदा हो गया कि आखिर गांधी ने ऐसा किया क्यूं? शायद ये और ज्यादा बड़ा सवाल तब बन गया जब सरदार पटेल के उम्मीदवार के पद से हटने की खबर सुनकर राजेंद्र प्रसाद के मुंह से एक ही बात निकली कि एक बार फिर गांधी ने अपने चहेते चमकदार चेहरे के लिए अपने विश्वासपात्र सैनिक की कुर्बानी दे दी।

नेहरू और पटेल के प्रति गांधी के रूख पर हुए अध्ययन के अनुसार गांधी को मॉडर्न विचार पसंद थे जिसकी झलक उन्हें विदेश में पढ़े नेहरू में दिखती थी। उन्हें लगता था कि नेहरू की नरम नीति देश के लिए सफल साबित होगी। दूसरी वजह यह थी कि नेहरू ने ये साफ जाहिर कर दिया था कि वह किसी व्यक्ति के आधीन कोई भी पद स्वीकार नहीं करेंगे। नेहरू से पक्षपाती स्नेह के कारण गांधी नेहरू की हार को अपनी हार के रूप में देख रहे थे।

कुछ सूत्रों का कहना है कि नेहरू ने तो गांधी को अध्यक्ष नहीं बनाए जाने पर अलग पार्टी बनाने तक की धमकी दे दी थी जिससे अंग्रेज़ों को भारत की आज़ादी टालने का मौका मिल जाता और साथ ही वह पूरे देश के सामने नेहरू द्बारा लज्जित हो जाते, इसी के चलते गांधी ने अपनी वीटो पावर का इस्तमाल नेहरू के पक्ष में किया। शायद यही वजह है कि गांधी ने ये कहा भी था कि पद और सत्ता की लालसा में नेहरू अंधे हो गए हैं।

गांधी ने जो किया उसे हर कोई गलत मानता है, उस पर सवाल उठना भी लाज़मी है लेकिन कहीं न कहीं सवाल सरदार पटेल पर भी उठे कि उन्होंने इसका विरोध क्यों नहीं किया? आखिर उनके लिए क्या जरूरी था- देश या गांधी?