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फैमिली के विरुद्ध जाकर सपने को किया साकार, नृत्य सीखने पोस्टर बांटने का काम भी किया

छाऊ, कथक, भरतनाट्यम जैसी शास्त्रीय विधाओं को शहर के युवक भी सीख रहे, राजधानी के लड़के भी शास्त्रीय नृत्य में बना रहे अलग पहचान

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भोपाल। भारतीय शास्त्रीय नृत्य को उपासना एवं साधना का माध्यम माना जाता है। प्राचीन समय में नृत्यांगनाएं मंदिरों में नृत्य प्रस्तुति देकर भगवान की आराधना करती थीं। लेकिन बदलते युग में मंच बदले और यहां तक कि साधक भी बदल गए। जहां मंदिरों का स्थान सभागारों ने ले लिया तो नृत्यांगनाओं की जगह अब नर्तक साधक बन गए हैं। आज विश्व नृत्य दिवस पर शहर के ऐसे नर्तकों की रोचक कहानी, जिन्होंने ऐसे शास्त्रीय नृत्य की दीक्षा ली जिसे एक जमाने में नृत्यांगनाएं करती थीं। उन्होंने ना सिर्फ दीक्षा ली बल्कि आज देश दुनिया में अपनी एक अलग पहचान स्थापित की है।

बहन को देखकर हुआ मोटिवेट
भरतनाट्यम नृतक 32 वर्षीय शिवाजी येवले बताते हैं, परिवार में किसी को मेरा डांस करना पसंद नहीं था, लेकिन जब मैं अपनी बहन और बड़े कलाकारों को भरतनाट्यम करते हुए देखता था तो मेरा भी मन करता था कि मैं भी इस तरह डांस करूं। इसके लिए 11वीं क्लास से ट्रेनिंग लेना शुरू किया। इसे सीखने में दो साल लगे। 50 लड़कियों के बीच मैं अकेला होता था, इसलिए मेरी लिए अपॉर्चुनिटी भी ज्यादा थी। मेरा मानना है कि किसी भी फील्ड में जाते ही सफलता नहीं मिलती है। आपको धैर्य रखना पड़ता है तब जाकर कामयाब हो पाते हैं।

विदेश में भी दे चुके परफॉर्मेंस
मयूरभंज छाऊ नृत्य की प्रस्तुति देने वाले दयानिधि मोहंता ने बताया कि मेरे परिवार में पापा, चाचा, नाना, मामा सभी शास्त्रीय संगीत-नृत्य से जुड़े हुए थे। उन्हें देखकर मैं भी तीसरी क्लास से छाऊ नृत्य करने लगा था। बड़े होकर इसी फील्ड में करियर बनाने का मैंने फैसला किया। 10 साल तक नृत्य गुरु परमानंद मोहंता से इसकी ट्रेङ्क्षनग ली। इस डांस में बॉडी का हर एक पार्ट मूवमेंट करता है। मार्शल आर्ट छाऊ नृत्य का ही एक आर्ट फॉर्म है। देश-विदेश में भी नृत्य प्रस्तुति दे चुका हूं।

परिवार ने किया विरोध
मिरेकल कंटेंपरेरी डांस के डायरेक्टर और कोरियोग्राफर योगेन्द्र सिंह राजपूत बताते हैं, मैंने फोक डांस से अपने करियर की शुरुआत की थी। जब भी किसी को कंटेंपरेरी डांस करते देखता था तो सोचता था कि मैं कब इस तरह डांस करूंगा। मैंने छाऊ, कंटेंपरेरी, मिरिकल कंटेंपरेरी की 4 से 5 साल ट्रेङ्क्षनग ली। यह शौक फैमिली को पसंद नहीं आया तो घर छोड़कर भोपाल आ गया और अपने जुनून को सच करने के लिए पोस्टर बांटने का काम भी किया।

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