यूं तो मैं वर्ष 1980 से रक्तदान कर रहा हूं, लेकिन तब तक इतना जुनूनी नहीं था। बात वर्ष 1984 की है, मुझे एक शादी में जाना था, घर से निकल ही रहा था कि ट्रैफिक डीएसपी पाठक का फोन आया। उन दिनों ट्रैफिक वार्डन के रूप में सेवाएं दिया करता था इसलिए उनसे जान-पहचान थी। उन्होंने बताया कि रॉयल मार्केट में बाइक सवार दो युवकों का एक्सीडेंट हो गया है, उन्हें तुरंत खून की जरूरत है। मैं तुरंत हमीदिया पहुंच गया और रक्तदान किया। जल्दबाजी में हाथ हिलाने से कुछ खून निकल गया। जब शादी में पहुंचा तो शर्ट पर खून देखकर सभी चितिंत हो गए। जब मैंने घटना बताई तो सभी ने तारीफ की और एक रिश्तेदार ने तुरंत नई शर्ट निकालकर मुझे दे दी। बात यहीं खत्म नहीं हुई, अगले दिन एसपी ऑफिस से मुझे बुलाया तो मुझे जरा भी अंदाजा नहीं था कि क्यों बुलाया गया है? आफिस पहुंचा तो देखा एसपी पन्नालाल जी के साथ डीएसपी पाठक और अन्य अफसर बैठे थे। एसपी ने मेरी तारीफ करते हुए बहुत प्रोत्साहित किया। एक रक्तदान से इतना प्रोत्साहन मिलने के बाद मैं दोगुने जोश से इस मुहिम में जुट गया जो आज तक जारी है।