
world organ donation
भोपाल. अंगदान organ donation को समाज में सबसे बड़ा दान माना जाता है, लेकिन अब भी हर साल शहर में कई पेशेंट की मौत सिर्फ इसलिए हो जाती है कि उन्हें समय पर डोनर donor नहीं मिल पाते। इस बीच कुछ ऐसे फरिश्तें भी हैं, जो अपनों की जिंदगी बचाने के लिए अंगदान कर मिसाल कायम कर रहे हैं। तो कई मामलों में मरीज patient के ब्रेन डेड होने के बाद परिजन हार्ट, लीवर, किडनी, आई डोनेट कर अंजान लोगों की जिंदगी को खुशियों से भर रहे हैं। उन्हें लगता है कि हमारे परिजन अब नई जिंदगी के दिल में धड़केगी। World organ donation day 2019 विश्व अंगदान दिवस के मौके पर पत्रिका प्लस ने अंगदान करने वालों से बात कर जाना कि अंगदान करते समय उनके मन में क्या चल रहा था।
190 मरीजों को आवश्यकता
एक बॉडी डोनेशन से आठ जिंदगियों को बचाया जा सकता है। आंख, स्कीन, हड्डी जैसे अन्य अंगों से भी लोगों के जीवन को बदला जा सकता है। भोपाल में पिछले तीन सालों में डोनेशन के 10 केस हुए है। इस साल दो मामलों में डोनेशन हुआ है। अभी भोपाल में करीब 190 मरीजों को अंगों की आवश्यकता है। किसी मरीज के ब्रेन डैन होने या हादसे के बाद मृतक के परिजनों का समझाना आसान नहीं होता। हालांकि अंगदान को लेकर अब समाज में अवेयरनेस बढ़ी है।
डॉ. अमिता चांद, प्रेसिडेंट, भोपाल ऑर्गन डोनेशन सोसायटी
3 जुलाई को ट्रांसप्लांट सफल रहा
करीब चार साल पहले हमें पता चला कि बेटे रवि की किडनी में प्रॉब्लम है। तीन साल तक लगातार डायलिसिस कराई गई। इसके बाद डॉक्टर ने किडनी ट्रांसप्लांट करने की बात कही। शुरू में हम सभी घबरा गए। मैंने फैसला किया कि मैं अपने बेटे को किडनी डोनेट करूंगी। जब जांच हुई तो पता चला कि हम दोनों का ब्लड ग्रुप मैच नहीं कर रहा है। मैंने हिम्मत नहीं हारी। अंतत: 3 जुलाई को ट्रांसप्लांट सफल रहा। मेरा बेटा और मैं दोनों स्वस्थ हैं।
अनिता सितोले, डोनर
मैंने किडनी डोनेट करने का फैसला किया
चार साल पहले पता चला कि छोटे भाई जितेन्द्र की दोनों किडनी डैमेज है। मैंने किडनी डोनेट करने का फैसला किया। लोगों ने कहा किडनी डोनेट करने से मुझे मुश्किल आएगी, लेकिन डॉक्टर्स ने बताया कि फिर भी सामान्य जीवन जिया जा सकता है। हम दोनों भाई अन्य लोगों की तरह सामान्य लाइफ जी रहे हैं।
ओमप्रकाश राजपूत, डोनर
मेरा भांजा दुनिया छोड़ गया
3 जुलाई 2018 को मेरा भांजा दुनिया छोड़ गया। हमने उसका हार्ट, किडनी, लीवर और आंखें दान कराईं। आज वह दूसरे के दिल में धड़क रहा है। उसकी आंखों से डॉक्टर्स पढ़ाई कर रहे हैं। अंगदान कर औरों की जिंदगी बचाई जा सकती है। समाज में हम सभी को इसकी पहल करना चाहिए।
महेन्द्र वर्मा
पहचान करने का सिस्टम नहीं
ब्रेन डेड की पहचान करने का सिस्टम नहीं है। यदि कोई मरीज ब्रेन डेड हो जाता है तो उसके परिजनों को समझाना आसान नहीं होता। स्वयं सेवी संगठन के सदस्य ही परिजनों को समझाकर अंगदान करने के लिए प्रेरित करते हैं। भोपाल में कैडाबरी में पांच, किडनी ट्रांसप्लांट के करीब 50 और लीवल ट्रांसप्लांट के एक से दो केस होते हैं। जबकि इतने ही मरीजों को अंगों की आवश्यकता होती है।
डॉ. सुबोध वाष्र्णेय, एमडी
Updated on:
13 Aug 2019 12:56 pm
Published on:
13 Aug 2019 09:40 am

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