आज मैं जो भी हूं, पिता जी की वजह से ही हूं। उन्हीं के प्रोत्साहन और सिध्दांतों को मैं अपने जीवन में उतारे हूं। पिताजी बहुत सिद्धांतवादी थे और उनका सबसे बड़ा सिध्दांत था ईमानदारी। उन्होंने पूरा जीवन हमको यही सिखाया। वे कहते थे कि बेटा जितना है, बहुत है और इसी में जीना सीखो। ईमानदारी की कमाई से आगे एक रुपया भी मत लेना। वे इतने नेक दिल थे कि हमेशा खुद से पहले दूसरों का भला करते थे। उन्होंने हम पर कोई चीज थोपी नहीं, बल्कि उनके जीवन जीने के तरीके से उनके सिध्दांत मैंने जीवन में उतारे। अपने आखिरी समय में वे हम सबसे कहकर गए थे कि सब मिलजुलकर रहना। मैं उन्हें सिर्फ इस दिन नहीं हर दिन मिस करता हूं।