
आधुनिकता की दौड़ में लुप्त होने लगा परंपरागत व्यवसाय
भागीरथ ज्याणी
बज्जू. आन, बान और शान के खातिर मेवाड़ से निकले गाडिय़ा लुहार ने मुगलों से युद्ध के दौरान महाराणा प्रताप के साथ जंगल-जंगल रहकर कई मुसीबतों का सामना किया, लेकिन अब सरकार व प्रशासन की अनदेखी के चलते गाडिय़ा लुहार कई मुसीबतों का सामना कर रहे हैं। सरकार की योजनाओं से तो यह पहले से महरूम है।अब बदलते दौर में आधुनिकता के चलते इनका परंपरागत व्यवसाय भी दम तोडऩे लगा है और बरसों बाद भी गाडिय़ा लुहार परिवार बदहाली की जिन्दगी जीने को मजबूर हैं।
बैलगाड़ी पर ही अपना घर व रोजगार का साधन बनाकर जीवन बसर करने वाले इन गाडिय़ा लुहारों के लिए सरकारों ने कई योजनाएं तो खूब चलाई, लेकिन नियम-कायदों में फंसी योजनाएं इनके लिए महज दिखावा साबित हो रही है। करीब डेढ़ दशक पूर्व तक तो इनके बनाए लोहे के औजार व उपकरण खेती समेत कई घरेलू उपयोग में लिए जाते थे, लेकिन अब मशीनरी का उपयोग होने से पारम्परिक औजारों की मांग खत्म सी हो गई है। इससे इनके सामने रोजगार क समस्या उत्पन्न हो गई है।
रोजी-रोटी के लाले
कस्बे समेत क्षेत्र में कई गाडिय़ा लुहार परिवार निवास करते हैं। यह पहले लोहे के औजार बनाने का काम करते थे, लेकिन अब इनकी बिक्री नहीं के बराबर होने के कारण कई परिवारों के सामने रोजी-रोटी चलाने का संकट खड़ा हो गया है। इसके चलते अब इनको दूसरे रोजगार का सहारा लेना पड़ रहा है। कोई फेरी लगाकर घरेलू जरूरत के सामान बेच रहा है तो कोई मजदूरी या कोई अन्य कार्य कर रहा है।
नहीं मिल रहा लाभ
गाडिय़ा लुहारों के नाम पर यूं तो सरकारी योजनाओं की भरमार है, लेकिन इन्हें राशन कार्ड से मिलने वाली सुविधाओं के सिवाय कोई अन्य लाभ नहीं मिल रहा। इन परिवारों का कहना है कि सिर छुपाने के लिए छत के साथ पेट की आग बुझाने के लिए रोजगार का भी बंदोबस्त हो जाए तो कुछ राहत मिलेगी।
युवा पीढ़ी का होता मोहभंग
इस समुदाय के युवाओं का भी परंपरागत कार्य से मोहभंग होने लगा है। अधिकत्तर युवा परम्परागत व्यवसाय छोड़कर दूसरा काम कर रहे हैं। परिवार के बुजुर्ग ही सड़क किनारे परम्परागत व्यवसाय को करते नजर आते है। परिवार के युवा कोई होटल-ढाबों पर काम कर रहा है तो कुछ ट्रक व्यवसाय व अन्य कार्य मे लग गए।
Published on:
03 Jan 2023 01:25 am
